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Wednesday, January 10, 2018

बदल डालो, दफा 302...सजा-ए-मौत...फांसी



https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AB%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B8%E0%A5%80

यह सुनकर रूह कांप जाती है. दिल-दिमाग कौंध उठता है. जिसे ये सजा मिलती है, उसकी आधी जान तो सजा सुनकर ही निकल जाती है. सजा सुनाने वाला जज भी अपने मन को काबू में नहीं रख पाता. एक तरह से जज की भी मानवीय संवेदनाएं उस एक दिन के लिए मर जाती हैं. जज अपनी कलम से सजा-ए-मौत के नाम पर न्याय की कसौटी पर खड़ा होता है. लेकिन सजा सुनाने के बाद जज की मनोदश समझना कठिन है. क्योंकि अदालत प्रत्यक्ष तौर पर संविधान की धारा 21 के तहत मुजरिम से जीने का अधिकार छीन लेती है. किसी व्यक्ति से जिंदगी जीने का अधिकार छीन लेना, यह मानव अधिकारों का खुला उल्लंघन है. हालांकि जज सजा भी संविधान की धाराओं के अंतर्गत ही देता है.

बहरहाल, आज बात मुजरिम और जज की मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं की नहीं है, बल्कि सजा-ए-मौत के तरीके पर उठने वाली बहस को लेकर चल रही है. 09 जनवरी मंगलवार को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र सरकार को मृत्युदंड के तहत फांसी के विकल्प सुझाने के लिए चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि दूसरे देशों में सजा-ए-मौत के लिए क्या तरीके अपनाए जाते हैं. उच्चतम न्यायालय ने यह साफ किया है कि वह यह तय नहीं करेगी कि मौत की सजा देने के लिए क्या तरीका अपनाया जाना चाहिए.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट का सोचना और इस बारे में गेंद केंद्र सरकार के पाले में उछाल देना, एक उचित ही कदम है. क्योंकि दुनिया भर में सजा-ए-मौत को लेकर अभी सस्पेंस बना हुआ है. कई देश में मुजरिम को मौत के घाट उतारने के लिए अपनाए जाने वाले तरीकों पर बहस चल रही है या फिर कानूनों में संशोंधन किया जा रहा है. पंजाब के बहुचिर्चत समाचार पत्र और वेबसाइट के अनुसार आंकड़ों के मुताबिक 2015 में मौत की सजा में दुनियाभर में 50 फीसदी इजाफा पाया गया था. इसके चलते 2014 में दुनियाभर में यह मुद्दा गंभीर रूप से उछला. लिहाजा वर्ष 2015 में ही 102 देशों ने सजा-ए-मौत का प्रावधान खत्म ही कर दिया. 141 देशों में फांसी की सजा खत्म कर दी गई है. साल 2016 में वेनिन और नौरू सरीखे छोटे देशों ने भी अपने कानून से सभी तरह के अपराधों के लिए मृत्युदंड की सजा खत्म कर दी है. भारत सहित 33 देशों में मौत के लिए फांसी ही एकमात्र प्रावधान है.



आंकड़ों के अनुसार दुनिया में 58 देश सजा-ए-मौत के लिए फांसी देते हैं. इंडोनेशिया सहित 73 देशों में सजा-ए-मौत के लिए गोली मारी जाती है. छह देशों में स्टोनिंग यानी पत्थर मारकर मृत्युदण्ड दिया जाता है. पांच देशों में इंजेक्शन देकर और तीन देशों में आरोपी का सर कलम करके सजा-ए-मौत का प्रावधान है. इसके अलावा दुनिया में 58 देश मृत्युदंड के मामले में काफी सक्रिय माने जाते हैं. जबकि 97 देश इसके प्रावधान को समाप्त कर चुके हैं. 2015 के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के 102 देशों ने मौत के प्रावधान को खत्म कर दिया है. चीन एकमात्र ऐसा देश है जहां इंजेक्शन और फायरिंग से मृत्युदंड दिया जाता है जबकि फिलीपींस में केवल इंजेक्शन से फांसी दी जाती है. अमेरिका में इलेक्ट्रोक्यूशन, गैस, फांसी और फायरिंग से सजा-ए-मौत के प्रावधान हैं.



अब सरकार को भी सोचना होगा कि सजा-ए-मौत के प्रावधान में क्या प्रगतिषील और सम्मानजनक विकल्प तैयार किए जाएं. क्योंकि याचिका कर्ता ऋषि मल्होत्रा की याचिका में कहा गया कि मृत्युदंड का तरीका सम्मानजनक होना चाहिए. फांसी की प्रक्रिया पूरी होने में 40 मिनट का समय लगता है. फांसी की सजा जीने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. सुनवाई के दौरान एडिशनल साॅलिसीटर जनरल पिंकी आनंद ने कहा कि फांसी की सजा ही कारगर है. घातक इंजेक्शन देना कारगर नहीं है.