Showing posts with label सियासत. Show all posts
Showing posts with label सियासत. Show all posts

Tuesday, June 19, 2018

...तो क्या देश में जॉब नहीं है


सिर्फ सर्च ही करते रहिए जॉब्स
जी हां, यह एक बड़ा और यक्ष सवाल है. तो क्या देश में जॉब नहीं है. बेरोजगार यूं ही भटकेंगे. उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी. उनकी पढ़ाई बेकार जाएगी. प्रोफेशनल और एकेडमिक एजुकेशन के सर्टिफिकेट महज एक कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएगी. देश में बढ़ती बेरोजगारी की दर को देखने के बाद तो कुछ यही माहौल बनता हुआ नजर आ रहा है. बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र के जरिए 2014 के चुनावी वादे में जिस तरह बेरोजगारों को रोजगार दिलाने का वादा किया था, आज वही बीजेपी सरकार अपनी सत्ता का एक सीजन खत्म करने के कगार पर आ चुकी है, लेकिन बेरोजगार वहीं का वहीं बेरोजगारी की दहलीज पर खड़ा हुआ है. चुनावी वादों के आसरे भाजपा ने सत्ता तो हासिल कर ली, लेकिन 18.6 मिलियन युवा आज भी रोजगार की राह को ताक रहा है. 24 जनवरी 2018 को बिजनेस स्टैंडर्ड की छपी रिपोर्ट बताती है कि बेरोजगारी की दर में बेतहाशा वृद्धि हो रही है. यह बढ़ती हुई रेट 3.5 परसेंट हैं. जो अब तक की सबसे ऊंची रेट है. इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (आईएलओ) भी इस बात को स्वीकार करता है. रिपोर्ट के मुताबिक आईएलओ ने कहा है कि 2017 में युवाओं की बेरोजगारी 18.6 मिलियन थी. जो 2018 में 3.5 परसेंट बढ़कर 18.6 मिलियन पर पहुंच गया है. यदि जॉब पैदा नहीं हुए और सरकारों ने रोजगार की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए तो यह ग्राफ 18.9 मिलियन तक के आंकड़े को क्रॉस कर जाएगा. यह दावा भी आईएलओ ने बिजनेस स्टैंडर्ड में किया है.
अब सवाल फिर से वही खड़ा हो जाता है कि
...तो क्या देश में जॉब नहीं है?
इसका जवाब है, नहीं, जॉब हैं. हजारों, लाखों में नहीं करोड़ों में हैं. भरपूर हैं. सरकार के पास भी हैं और प्राइवेट सेक्टर में भी. इसका भी आंकड़ा आपको बतलाते हैं.
17271000 नौकरियां सरकारी क्षेत्र में मौजूदा वक्त पर कैंडिडेट्स की राह तक रहीं हैं.
11422000 नौकरी प्राइवेट सेक्टर में खाली हैं.
43 करोड़ 70 लाख नौकरी असंगठित क्षेत्र में हैं.
इस तरह देखा जाए तो यदि यह जॉब भर लिए जाएं तो देश में बेरोजगारी पल भर में खत्म हो सकती हैं. लेकिन देश में ऐसा हो नहीं रहा. इसके पीछे क्या वजह मानी जाए. कि सरकारें इन जॉब से अनभिज्ञ हैं, लेकिन जब देश के सरकारी संगठन या अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ इस बात की पुष्टि करे कि जॉब हैं तो सरकारों की अनभिज्ञता झुठला जाती है. दूसरा कारण, सत्ता खुद ही नहीं चाहती है कि यह जॉब देश भर के उन तमाम युवाओं को दी जाएं, रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं. सरकार के ऐसा न करने के पीछे मंशा क्या है, यह भी जानना जरूरी है. दरअसल, बेरोजगारी के आसरे सियासी दल अपनी चुनावी रोटियां पकाते हैं. बेरोजगारी उनके घोषणा पत्र में अव्वल नंबर पर रहता है, यदि यह खत्म हो गया तो फिर वह क्या मुद्दा टॉप पर रखेंगे, यह उनके लिए 'प्रॉमिस क्राइसिसÓ की कैटेगिरी में आ जाएगा.
लिहाजा एक बार फिर हम उसी सवाल पर आकर खड़ा हो जाते हैं कि
...तो क्या देश में सरकारें जॉब नहीं दे रही हैं?
उत्तर है जी नहीं. सरकारें जॉब बांट रहीं हैं. यह बात अलग है कि उनका बांटने का ग्राफ कछुआ चाल है. आंकड़े बताते हैं कि पांच साल के अंदर ग्रेजुएट किए युवाओं के लिए सिर्फ 8000 से ज्यादा सरकारी जॉब निकलती नहीं है. साल में औसतन 667 से ही सरकारी मुलाजिम बन पाते हैं. यानी जितने युवा नौकरी पाते हैं, उससे कई सौ गुना युवा बेरोजगार की कतार में खड़े नजर आते हैं. तो क्या इसी दिन के लिए देश में बीजेपी को गद्दीनशीन कराया गया था बेरोजगारों के द्वारा. यदि हां, तो फिर खड़े रहिए बेरोजगार की लाइन में. क्योंकि सियासी बिसात पर सत्ता तो अपनी चाल ऐसे ही चलेगी. उसके लिए बेरोजगार सिर्फ एक प्यादा हैं, यदि उन्हें मारने से सियासी बिसात पर 'राजाÓ बचता है तो उन्हें डेंजर कॉलम में रखने के लिए सियासी धुरंधरों के हाथ बिलकुल नहीं कांपेंगे. 

Wednesday, April 25, 2018

गठबंधन तो ठीक पर सीट बंटवारे पर मुश्किल


सियासत में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती हैं: कहावत 

मुद्दों के आसरे कभी एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लडऩे वाली पार्टियां अब एक मंच के नीचे ही मोदी लहर के खिलाफ एकजुट होने की कवायद करने में जुटी है. यानि 2019 में महागठबंधन के आसरे ही क्षत्रप राजनीति को ऑक्सीजन मिलेगी. और अगर मोदी लहर को हराने में कामयाब रही तो यही गठबंधन दिल्ली की गद्दी पर भी अपना दावा ठोंक सकेगा.
अखिलेश और मायावती के साथ आने से एक ओर जहां यूपी की सियासी तस्वीर बदलने लगी है तो वहीं दूसरी ओर देश में मोदी को रोकने के लिए एक सियासी मुहिम शुरू हो चुकी है. हालांकि, 2014 के आम चुनाव में जिस प्रकार से मोदी ने तमाम क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया था. अब वहीं क्षेत्रीय दल महागठबंधन के आसरे ही अपनी जमीन तलाश रहे हैं. मायावती, अखिलेश ने 2019 के लिए गठबंधन का ऐलान किया है.
कांग्रेस यदि गठबंधन का हिस्सा नहीं बनी, तो भी एसपी-बीएसपी उसके लिए दो सीटें छोड़ेंगी. लोकसभा चुनाव 2019 के लिए सीट बंटवारे की कसरत में जुटी दोनों पार्टियों ने तय किया है कि रायबरेली और अमेठी सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारेंगी. फिलहाल एसपी-बीएसपी 78 सीटों पर चुनाव लडऩे की तैयारी के साथ सीट बंटवारे को अंतिम रूप दे रही हैं.
हालांकि, अब सबसे ज्यादा नजर यही रहेगी कि यूपी में सपा और बसपा के बीच सीटों को लेकर तालमेल कैसे बनता है. दरअसल, मायावती और अखिलेश के सियासी वजूद के बीच कांग्रेस भी अगर गठबंधन में शामिल होती है तो स्थितियां कुछ भी पेचीदा हो सकती हैं.
ऐसी स्थिति में बीएसपी का पलड़ा भारी है. मायावती लगातार यह भी इशारा करती रही हैं कि वह गठबंधन करेंगी तो उन्हें सम्मानजक सीटें चाहिए. वहीं अखिलेश भी राज्यसभा में बीएसपी की हार के बाद कह चुके हैं कि समाजवादी बड़े दिल वाले हैं.


  
 योगेश मिश्रा
(गेस्ट राइटर)