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Friday, November 30, 2018

आक्रोश में अन्नदाता

सभी फोटोज: अभिजीत शर्मा

रामलीला मैदान में बृहस्पतिवार से डेरा डाले देशभर से आए हजारों किसानों ने आज भारी-भरकम सुरक्षा के बीच संसद मार्ग पर बैठे हुए हैं. कर्ज राहत और उपज का उचित मूल्य देने समेत उनकी कई मांगें हैं. आंध्र प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश समेत देशभर से आए किसान बृहस्पतिवार को रामलीला मैदान में इकट्ठे हुए हैं.
सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाकर बीते दिनों किसान संसद की तरफ से पारित दो अहम विधेयकों को पास कराए. पहला कानून किसानों को एक बार में पूरी तरह से ऋण मुक्त किया जाए. दूसरा कृषि उपज का उचित और लाभकारी मूल्य से जुड़ा है. इसमें किसानों की आय फसल की लागत का डेढ़ गुना करने का प्रावधान है.

देश के तमाम राज्यों में 207 किसान संगठन संयुक्त रूप से प्रदर्शन कर रहे हैं. दरअसल, किसान अपनी उपज के लिए लाभकारी दाम, स्वामीनाथ आयोग की सिफारिशें लागू करने एवं कृषि ऋण माफ करने की मांग कर रहे हैं. उन्होंने शहरों में सब्जियों, फलों, दूध और अन्य खाद्य पदार्थों की आपूर्ति रोक दी है. व्यापारियों का कहना है कि आपूर्ति में कमी के चलते सब्जियों एवं अन्य खाद्य पदार्थों के भाव बढ़ गए हैं.

महज वोटर हैं किसान

इन परिस्थितियों को देखने के बाद जेहन में बहुतेरे सवाल उठने लगते हैं. सबसे अहम और चौंकाने वाला सवाल तो यह है कि आखिर किसान को अपनी सुविधाओं के लिए कृषि प्रधान देश में आंदोलन के लिए सड़क पर आना ही क्यों पड़ता है? इसका जवाब किसी सरकार के पास नहीं है. न तो पूर्ववर्ती कांग्रेस की सरकार के पास और ना ही मौजूदा वक्त में भाजपा की सरकार के पास. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि किसानों को सिर्फ सरकारों ने वोट बैंक ही माना है. राष्ट्र की एक संपदा के रूप में काम करने वाले किसान सियासी दलों के लिए महज वोटर बनकर ही रह गए हैं.

समस्याओं पर हाथ कोई नहीं रखता

चुनावी सीजन में लुभावनी घोषणाओं के जरिए अपने पक्ष में किसानों से वोट करवा लिया जाता है. फिर पांच साल अन्नदाता अपने अन्न के लिए मोहताज बना रहता है. सिर्फ घोषणाओं के आसरे किसानों को रिझाने की कोशिश की जाती है, लेकिन उनकी मूल समस्या पर हाथ नहीं रखा है. लिहाजा पहले किसानों की समस्याओं पर फोकस करना जरूरी हो जाता है. वो कौन सी जरूरतें हैं, जिनके समाधान के लिए किसानों को लगभग हर साल या फसली सीजन में अपना घर, खेत और गांव छोड़कर सड़क पर आना पड़ता है. समाधान को यदि सरकारें गंभीरता से ले लें तो किसान ही नहीं शहर में रहने वाले लोगों का जीवन भी सरल हो सकेगा. महंगाई के हालात नहीं बनेंगे और किसानों के आंदोलन की आग से शहरवासी भी नहीं झुलसेंगे. सरकार को इस विषय पर सोचने की जरूरत है.

Thursday, November 29, 2018

'मिताली' पर पितृ सत्तात्मक सोच का 'राज'!



आधुनिकता की चकाचौंध से गर्वित होता अपना देश अभी सामंती सोच से उबर नहीं सका है। भारतीय क्रिकेट टीम की हरफनमौला और रनमशीन कही जाने वाली मिताली राज भी इसका शिकार हुई लगती हैं। टी-20 वर्ल्ड कप में मिताली राज और भारतीय महिला क्रिकेट टीम को जो आशाजनक परिणाम हाथ नहीं लगे, उसके पीछे पितृ सत्तात्मक सोच की प्रबलता से इनकार नहीं किया जा सकता है।
वजह साफ है, टी-20 वर्ल्ड कप के पांच मैच में से तीन में मिताली ने बल्लेबाजी नहीं की। बावजूद इसके वे सबसे ज्यादा रन बनाने वाले टॉप-4 भारतीय बल्लेबाजों में रहीं। उन्होंने 2 मैचों में ही 107 रन बना डाले। इसके इतर हरमनप्रीत ने पांचों मैच में बैटिंग की और 183 रन बनाए। पिछले 20 साल से लगातार अपनी सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंस के बल पर सुर्खियों में रहने वालीं मिताली टी-20 फॉर्मेट में भारतीय बल्लेबाजों से कहीं ज्यादा आगे हैं। 15 नवंबर 2018 तक मिताली 2283 रन बनाकर टी-20 फॉर्मेट में टॉप पर रहीं। जबकि भारतीय पुरूष टीम के हिटमैन कहे जाने वाले रोहित शर्मा 2207 रन बनाकर उनसे दूसरे नंबर पर हैं। विराट कोहली जैसे बल्लेबाज 2102 रन के साथ तीसरे पायदान पर हैं और टी-20 वर्ल्ड कप में टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर 1827 रन के साथ चौथे स्थान पर हैं।
इन्हीं आंकड़ों को यदि मद्देनजर रखा जाए और सेमीफाइनल मैच में मिताली को टीम से बाहर रखने पर शुरू हुए विवाद की जड़ों को खंगाला जाए तो जाहिर तौर पर हर कोई यह सोचने पर मजबूर हो जाएगा कि कहीं न कहीं मिताली किसी बड़ी और गहरी साजिश का शिकार हुईं हैं। मिताली को महत्वपूर्ण मैचों से साइडलाइन करने में हुई साजिश की आशंकाओं को इसलिए भी दरकिनार नहीं किया जा सकता क्योंकि इसके पीछे कई कारण हैं।
अव्वल तो यही है कि भारतीय पुरूष खिलाड़ियों का रिकॉर्ड एक महिला खिलाड़ी खराब किए दे रही है। बीसीसीआई की अपेक्षाकृत कम सुविधा और फीस न मिलने के बावजूद मिताली विराट और रोहित जैसे क्रिकेटर्स से आगे बनी हुई है तो धौनी जैसे धुरंधर उसके टी-20 रिकॉर्ड के आगे पानी नहीं मांग पा रहे। 27 नवंबर 2018 को मिताली ने बीसीसीआई को एक ईमेल के जरिए जो पत्र भेजा उसमें अपनी पीड़ा को लिखते हुए खुलकर कोच रमेश पोवार पर पक्षपात करने का आरोप लगाया।


मिताली ने ऐसी कई घटनाओं का जिक्र करते हुए लिखा, ‘उदाहरण के लिए, मैं जहां भी कहीं बैठती थी, वे उठकर चले जाते थे, नेट्स पर जब दूसरी बल्लेबाज अभ्यास कर रही होती थीं तो वे मौजूद रहते थे, लेकिन जैसे ही मैं बल्लेबाजी के लिए जाती, वे वहां से चले जाते थे। यदि मैं उनसे बात करने की कोशिश करती तो वे अपने फोन में कुछ देखने लगते और वहां से निकल जाते। यह किसी के लिए भी शर्मनाक था। यह बिल्कुल स्पष्ट था कि मुझे अपमानित किया जा रहा था। इसके बावजूद मैंने कभी भी अपना धैर्य नहीं खोया।’ इस बात से तय है कि क्रिकेट जगत में एक महिला खिलाड़ी कैसे आगे बढ़ सकती है। यही सोच कुछ लोगों की बनी हुई है।
दूसरी सबसे बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि एक भारतीय महिला खिलाड़ी इंटरनेशनल लेवल पर अपनी पहचान बनाकर खड़ी हुई है तो उसे डाउन टू अर्थ करने के लिए बीसीसीआई और आईसीसी सरीखी संस्थाओं के पदाधिकारी मौन बने हुए हैं। मिताली की मजबूती से पैरवी करने वाली कोई पदाधिकारी नजर नहीं आता है। यह बात खुद मिताली ने बीसीसीआई के सीईओ राहुल जौहरी और महाप्रबंधक (क्रिकेट ऑपरेशंस) सबा करीम को लिखे लैटर में स्वीकारी है। हालांकि, बुधवार को वेबसाइट 'ईएसपीएन' की रिपोर्ट के अनुसार, महिला टीम के मुख्य कोच रमेश पोवार ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को सौंपी गई रिपोर्ट में मिताली पर कोचों को ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया है।

पोवार ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मिताली ने उन्हें ओपनिंग बल्लेबाजी का मौका नहीं मिलने पर महिला वर्ल्ड टी-20 से नाम वापस लेने और संन्यास लेने की धमकी दी थी। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय महिला वनडे टीम की कप्तान मिताली को कोचों को ब्लैकमेल करना और उन पर दबाव डालना बंद करना चाहिए। उन्हें खुद से पहले टीम के हित को देखना चाहिए। जबकि दैनिक भास्कर में छपी खबर के मुताबिक उन्होंने कहा है, ‘20 साल के करियर में मैं पहली बार खुद को अपमानित, हतोत्साहित, निराश महसूस कर रही हूं। मैं यह सोचने पर मजबूर हूं कि जो लोग मेरा करियर तबाह करना चाहते हैं और मेरा आत्मविश्वास तोड़ना चाहते हैं, उनके लिए देश को दी जाने वाली मेरी सेवाओं की कोई अहमियत नहीं है।’
मिताली ने पत्र में प्रशासकों की समिति (सीओए) की सदस्य डायना एडुल्जी को पक्षपाती करार दिया। मिताली ने लिखा, ‘मैंने डायना एडुल्जी में हमेशा विश्वास जाहिर किया है। सीओए की सदस्य के तौर पर मैंने हमेशा उनकी इज्जत की है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि वे मेरे खिलाफ अपने पद का इस्तेमाल करेंगी। उन्होंने मीडिया में टी-20 विश्व कप के सेमीफाइनल में मुझे बेंच पर बैठाने के फैसले का जोरदार समर्थन किया। इस बात ने मुझे बहुत परेशान किया, क्योंकि मैंने उन्हें वास्तविक तथ्यों से अवगत कराया था।’


मिताली ने यह भी लिखा है कि ‘मैं टी-20 की कप्तान हरमनप्रीत के खिलाफ नहीं हूं, सिवाय इसके कि उन्होंने आखिरी-11 से मुझे बाहर रखने के कोच के फैसला का समर्थन किया। वह फैसला समझ से परे है। और यह कदम टीम के लिए हानिकारक साबित हुआ। मैं अपने देश के लिए वर्ल्ड कप जीतना चाहती हूं। कोच के फैसले से मैं दुखी हूं कि हमने एक सुनहरा मौका गंवा दिया।’ तो तीसरा कारण भी मिताली की इसी बात से जुड़ा हुआ है। मान लेते हैं कि मिताली टीम को वर्ल्ड कप दिलाने में अहम किरदार अदा करतीं। क्योंकि मिताली भारतीय महिला क्रिकेट टीम की सबसे कामयाब बल्लेबाज हैं।
जाहिर तौर पर उनकी प्रसिद्धि आसमान छू जाती। जो सीधे तौर पर विज्ञापन कंपनियों की निगाह में आ जाती और मिताली एक चिर-परिचित चेहरे से ब्रांड या यूं भी कह सकते हैं सेलिब्रिटी बन जातीं। जो पितृ सत्तात्मक सोच रखने वाले पुरूषों की लॉबी को किसी तरह से गले नहीं उतरती। एक तरह से विज्ञापन कंपनियां अर्ष पर पहुंचे खिलाड़ियों को साइडलाइन कर मिताली की चौखट पर खड़ीं होतीं। मगर, अफसोस ऐसा हो नहीं सका, कुछ लोग अपने मंसूबे में शायद कारगर साबित हुए।
इतिहास खुद को दोहराता है। यह बात भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए अहम है। जो आज मिताली के साथ हो रहा है, कल यह दोहराव किसी और खिलाड़ी के साथ भी घट सकता है। लिहाजा यह सबक भी है और एक नसीहत भी। अन्य खिलाड़ी यदि इस घटना को प्रमुखता से उठाकर अपनी ही साथी की पैरोकारी करें तो बीसीसीआई और आईसीसी में बैठे आला अफसरों के कानों में पड़ी ठेठ को निकालने के लिए काफी होगी।

Tuesday, November 20, 2018

लाठी है हानिकारक, प्रहारक, आधारक




लाठी। यह शब्द सुनने के बाद ही दिल और दिमाग में बांस का एक मजबूत टुकड़े की तसवीर नजर आने लगती है। वर्तमान में देश के एक मजबूत संगठन का प्रतीक भी है लाठी। पंजाब और हरियाणा के लिए तो यह विशेष तौर पर पहचान रखती है। यहाँ रहवासियों के लिए किसी शान से कम नहीं है। लेकिन देखा जाए तो लगभग हर शख्स की ज़िंदगी से लाठी जुड़ी हुई है। जीवन की किसी भी अवस्था में एक बार व्यक्ति इसका प्रयोग करने से नहीं चूकता। बचपन, यौवन और बुढापा। ज़िंदगी के यह तीन रूप हैं। और मैंने महसूस किया कि लगभग तीनों ही रूपों में लाठी किसी न किसी तरह लोगों के साथ रहती है। लेकिन एक और तथ्य और मेरी समझ में 18 नवंबर को उस वक़्त आया जब मोरारी बापू जी के प्रवचन सुने। लाइव नहीं, ऑनलाइन उनके एप पर। मथुरा के विश्राम घाट पर वह राम कथा का रसास्वादन करा रहे थे।


उस दौरान उन्होंने बताया कि लाठी ज़िंदगी के तीनों ही अवस्था में साथ रहती है, लेकिन बाल्यकाल में लाठी व्यक्ति के लिए एक असुरक्षित और असुविधाजनक वस्तु बनकर सामने आती है। क्योंकि बच्चे के हाथ जब लाठी रहती है तो वह निश्चित तौर पर हानिकारक रहेगी। बच्चा हाथ में लाठी लेगा तो वस्तुओं को तोड़ने का काम करता है। वह उससे खेल नहीं सकता। बल्कि वह अपने आप को या किसी अपने को चोट ही देेगा। इसके विपरीत युवावस्था में प्रहारक सिद्ध होती है। इसे हम यूं समझ सकते हैं कि व्यक्ति अपने युवा काल को जीता है तो उसमें ऊर्जा और उत्साह का प्रवाह कुछ ज्यादा ही रहता है। इस जोश में वह अपनी आत्मरक्षा और आत्मबल का प्रदशन करने के लिए लाठी का ही सहारा लेता है। जो उसके लिए प्रहारक साबित होती है। अब आते हैं जिंदगी के अंतिम पड़ाव यानी बुढ़ापा। बुढ़ापे में तन को सीधा चलाने और झुकी कमर का आधारक लाठी ही बनती है। देखा जाए तो लाठी हानिकारक, प्रहारक और आधारक है, और जिंदगी के हर अवस्था में साथ रहती है।

Monday, August 6, 2018

गमों का तूफान दिल में समेटकर हंसी की सुनामी लाने का नाम है जोकर


जोकर। नाम सुनकर दिल और दिमाग पर रंग-पुता चेहरा, नाक पर चेरी, आंखें बड़ी-बड़ी, तन पर चटख रंग के परिधान और गुदगुदाती हरकतों से भरी तस्वीर सामने आ जाती है। अधिकांश लोग जोकर के रूप में राजकपूर की इमेजिन कर लेते हैं तो कोई 52 प्लेकार्ड के पैकेट में निकलने वाले जोकर को अपनी आंखों के सामने ले आते हैं। जोकर कई रूप धरकर आता है। हमको हंसाता है। इतना हंसाता है कि हम अपने गम भूल जाते हैं। यह एक कला है। साधना से आती है। कठिन है, मगर से इंसान की जिद से बढ़कर नहीं। सीखता इंसान ही है। कब, क्यों और कहां पलते हैं यह जोकर। कोई पता नहीं। इनका कोई अपना निजी संसार नहीं है। बचपन में ही जब कोई डॉक्टर, इंजीनियर या बैंकर्स बनने के ख्बाव बुनता है तो हम उन हजारों में या यूं कहिए लाखों में से एक कोई बंदा जोकर बनने का सपना पालता है। यह सपना उसके सामने कोई शुरू से नहीं होता, बल्कि मजबूरी में उठाया गया एक कदम होता है। इसके पीछे मुफलिसी होती है, हिकारत होती है, नफरत होती है या फिर मोहब्बत भी हो सकती है। राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर देखिए। खुद-ब-खुद समझ जाएंगे, लेकिन एक जोकर की जिंदगी वास्तव में क्या होती है, इससे वाकिफ होना भी जरूरी है। गमों के तूफानों को अपने दिल में समाकर हंसी की सुनामी लेकर आता है। फिर चाहे वह मंच हो या फिर सर्कस की रिंग। उसे हंसाना ही पड़ता है। फिर चाहे मालिक हंटर चलाए या वह खुद की मर्जी से काम करे, लेकिन हंसाता जरूर है।


 एक जोकर की कहानी याद आती है, लेकिन यह काफी चौंकाने वाली है। जब से यह कहानी सुनी है, जोकर को देख हंसी कम शक की गुंजाइश ज्यादा बढ़ जाती है। अपने ही देश की है। आतंकी घटनाओं से लगभग हर दिन रूबरू होने वाली सरजमीं से जुड़ी है। बात जम्मू और कश्मीर की कर रहा हूं।  एक जोकर जो कश्मीर की वादियों को हंसाता था। लोगों की उदासी दूर कर चेहरे पर मुस्कान लाता था, लेकिन लोगों को हंसाने वाला सब के गम खुशियों में बदलने वाला एक कश्मीरी युवक कब आतंक का पर्याय बन गया कोई समझ नहीं पाया। डर और मौत का घर बन चुका आतंकी सद्दाम पाडर मौजूदा वक्त में तो जिंदा नहीं है, लेकिन उसके किस्से-कहानी आज भी वादियों में युवाओं के होंठों पर रहते हैं। सुना और पढ़ा है सिर्फ मैंने कि वह जब समय बचता था तो गांव के चौराहे पर लोगों को हंसाया करता था। साथ ही क्रिकेट खेलता दिखता था। उसके बारे में कहा जाता था कि वह लोगों को हंसाने में इतना माहिर था कि उसे देखते ही लोग हंसने लगते थे। सद्दाम को सब जोकर समझते थे, लेकिन एक जोकर ने आतंकी संगठन का हाथ थामा और उसके बाद लोग उसके नाम पर हंसने की जगह उससे डरने, सहमने लगे। यानी इंसान जोकर भी है और आतंकी भी। अब तय हम को ही खुद करना है कि बनना क्या है। 

Wednesday, June 20, 2018

...पर गजब भी है जिंदगी



जिंदगी भी बड़ी अजीब है. खेल निराले हैं इसके. कभी हंसाती है. गुदगुदाती है. मुस्कुराती है. छेड़ती है और छोड़कर भी चली जाती है. पल में रंग बदल लेती है. रफ्तार भी पकड़ लेती है. गुमसुम भी बैठ जाती है. आशा और निराशा. दोनों का अनुभव कराती है. मन को झिंझोड़ देती है तो सुकून का अहसास भी इसी जिंदगी में मिलता है. कुछ और भी है जिंदगी के हिस्से में.

कभी जिंदगी के सामने आगे बढऩे का एक रास्ता नहीं सूझता तो कभी कई रास्ते खोल देती है. यह हालात अकेले मेरे साथ नहीं. सबके साथ होता है. कभी एक रास्ता दिखता नहीं और जाना जरूरी होता है. कभी कई रास्ते होते हैं तो एक कदम नहीं बढ़ पाता. नहीं तय कर पाते कि कौन सा रास्ता जिंदगी को मंजिल की तरफ ले जाएगा. मंजिल तक पहुंचाएगा भी या नहीं, यह अंर्तद्वंद जिंदगी को हिलाता रहता है.

फिर भी रास्ता तो चुनना पड़ता है जिंदगी को. कई में से एक राह. गलत चुन ली तो जिंदगी से जंग शुरू हो जाती है. हर कदम पर जद्दोजहद करनी पड़ती है. और सही राह चुनी तो जिंदगी की चाल-चलन ही बदल जाती है. मंजिल का सफर आसान लगता है. यह बात अलग है कि मुश्किल होती है. शुरूआत में कठिनाई आती है, लेकिन चलती है मस्तानी चाल.


यूं ही चलता रहता है इस जिंदगी का सफर. परायों का साथ छूटता नहीं है. अपनों का हाथ पकड़ नहीं आता. है ना अजब जिंदगी, पर गजब भी है जिंदगी...

रंज, गम, चैन ओ सुखन के तमाशे देखे इस जिंदगी ने, 
अपनों से छूटते और परायों से जुड़ते नाते देखे जिंदगी ने. 

Tuesday, June 19, 2018

...तो क्या देश में जॉब नहीं है


सिर्फ सर्च ही करते रहिए जॉब्स
जी हां, यह एक बड़ा और यक्ष सवाल है. तो क्या देश में जॉब नहीं है. बेरोजगार यूं ही भटकेंगे. उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी. उनकी पढ़ाई बेकार जाएगी. प्रोफेशनल और एकेडमिक एजुकेशन के सर्टिफिकेट महज एक कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएगी. देश में बढ़ती बेरोजगारी की दर को देखने के बाद तो कुछ यही माहौल बनता हुआ नजर आ रहा है. बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र के जरिए 2014 के चुनावी वादे में जिस तरह बेरोजगारों को रोजगार दिलाने का वादा किया था, आज वही बीजेपी सरकार अपनी सत्ता का एक सीजन खत्म करने के कगार पर आ चुकी है, लेकिन बेरोजगार वहीं का वहीं बेरोजगारी की दहलीज पर खड़ा हुआ है. चुनावी वादों के आसरे भाजपा ने सत्ता तो हासिल कर ली, लेकिन 18.6 मिलियन युवा आज भी रोजगार की राह को ताक रहा है. 24 जनवरी 2018 को बिजनेस स्टैंडर्ड की छपी रिपोर्ट बताती है कि बेरोजगारी की दर में बेतहाशा वृद्धि हो रही है. यह बढ़ती हुई रेट 3.5 परसेंट हैं. जो अब तक की सबसे ऊंची रेट है. इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (आईएलओ) भी इस बात को स्वीकार करता है. रिपोर्ट के मुताबिक आईएलओ ने कहा है कि 2017 में युवाओं की बेरोजगारी 18.6 मिलियन थी. जो 2018 में 3.5 परसेंट बढ़कर 18.6 मिलियन पर पहुंच गया है. यदि जॉब पैदा नहीं हुए और सरकारों ने रोजगार की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए तो यह ग्राफ 18.9 मिलियन तक के आंकड़े को क्रॉस कर जाएगा. यह दावा भी आईएलओ ने बिजनेस स्टैंडर्ड में किया है.
अब सवाल फिर से वही खड़ा हो जाता है कि
...तो क्या देश में जॉब नहीं है?
इसका जवाब है, नहीं, जॉब हैं. हजारों, लाखों में नहीं करोड़ों में हैं. भरपूर हैं. सरकार के पास भी हैं और प्राइवेट सेक्टर में भी. इसका भी आंकड़ा आपको बतलाते हैं.
17271000 नौकरियां सरकारी क्षेत्र में मौजूदा वक्त पर कैंडिडेट्स की राह तक रहीं हैं.
11422000 नौकरी प्राइवेट सेक्टर में खाली हैं.
43 करोड़ 70 लाख नौकरी असंगठित क्षेत्र में हैं.
इस तरह देखा जाए तो यदि यह जॉब भर लिए जाएं तो देश में बेरोजगारी पल भर में खत्म हो सकती हैं. लेकिन देश में ऐसा हो नहीं रहा. इसके पीछे क्या वजह मानी जाए. कि सरकारें इन जॉब से अनभिज्ञ हैं, लेकिन जब देश के सरकारी संगठन या अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ इस बात की पुष्टि करे कि जॉब हैं तो सरकारों की अनभिज्ञता झुठला जाती है. दूसरा कारण, सत्ता खुद ही नहीं चाहती है कि यह जॉब देश भर के उन तमाम युवाओं को दी जाएं, रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं. सरकार के ऐसा न करने के पीछे मंशा क्या है, यह भी जानना जरूरी है. दरअसल, बेरोजगारी के आसरे सियासी दल अपनी चुनावी रोटियां पकाते हैं. बेरोजगारी उनके घोषणा पत्र में अव्वल नंबर पर रहता है, यदि यह खत्म हो गया तो फिर वह क्या मुद्दा टॉप पर रखेंगे, यह उनके लिए 'प्रॉमिस क्राइसिसÓ की कैटेगिरी में आ जाएगा.
लिहाजा एक बार फिर हम उसी सवाल पर आकर खड़ा हो जाते हैं कि
...तो क्या देश में सरकारें जॉब नहीं दे रही हैं?
उत्तर है जी नहीं. सरकारें जॉब बांट रहीं हैं. यह बात अलग है कि उनका बांटने का ग्राफ कछुआ चाल है. आंकड़े बताते हैं कि पांच साल के अंदर ग्रेजुएट किए युवाओं के लिए सिर्फ 8000 से ज्यादा सरकारी जॉब निकलती नहीं है. साल में औसतन 667 से ही सरकारी मुलाजिम बन पाते हैं. यानी जितने युवा नौकरी पाते हैं, उससे कई सौ गुना युवा बेरोजगार की कतार में खड़े नजर आते हैं. तो क्या इसी दिन के लिए देश में बीजेपी को गद्दीनशीन कराया गया था बेरोजगारों के द्वारा. यदि हां, तो फिर खड़े रहिए बेरोजगार की लाइन में. क्योंकि सियासी बिसात पर सत्ता तो अपनी चाल ऐसे ही चलेगी. उसके लिए बेरोजगार सिर्फ एक प्यादा हैं, यदि उन्हें मारने से सियासी बिसात पर 'राजाÓ बचता है तो उन्हें डेंजर कॉलम में रखने के लिए सियासी धुरंधरों के हाथ बिलकुल नहीं कांपेंगे. 

Thursday, May 31, 2018

अध्ययन औऱ अध्यात्म का सफर

काम का बोझ और मौसम की तपिश ने झिझोड़ कर रख दिया है। शांति की तलाश चाहिए। अध्यात्म भी जरूरी है। सो चल पड़ा हूँ मैं। आगरा से माउंट आबू की तरफ। स्टेशन पर पहुंचकर लगा कि कमजोर काया कैसे चल पाएगी, लेकिन लगभग एक साल के बाद आज फिर से देशाटन के उत्साह ने लबरेज कर दिया है। 3 मंजिला सीढ़ी चढ़ना मुमकिन नहीं था मेरे लिए, फिर भी अपने साथी मिस्टर जॉनी (अमर उजाला में कार्यरत) के उत्साहवर्धन और सहयोग ने मुझमें ऊर्जा का संचार भर दिया। प्लेटफार्म पर पहुंच गया तो ट्रेन भी खड़ी मिली। अपनी सीट तलाशी और बैठ गया पालती मारकर। फिर वही यात्रा का आनंद लेते हुए चला। कोच में रौनक बनी हुई है। 5 साल की बच्ची अपनी माँ के पास पापा से गर्मी लगने की कह रही है। रेलवे पुलिस फोर्स गश्ती पर है। मिडिल बर्थ खुलने लगी है। ट्रेन रफ़्तार पकड़ चुकी है। धीरे-धीरे लोग सीट पर जमकर नींद के आग़ोश में जा रहे हैं। चारों तरफ अंधेरा औऱ दूर चमकती हुई लाइट्स मेरे शहर के पीछे छूटने के संकेत दे रहीं हैं। मेरी आंखों में नींद ने दस्तक देने की शुरुआत कर दी है। शहर पीछे छूट गया। और मैं भी अब सोने के मूड में हूँ। सो अब सोते हैं। कल 10 बजे अपनी मंजिल पर पहुंचने पर फिर आपसे बात करेंगे।

Monday, May 7, 2018

और कहूं तो...

घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

मेरे विदेशी मित्र ने मुझसे एक बार पूछा कि आपका देश क्या है, आप कहां रहते हो? 
सवाल सीधा था, सरल था, पर शायद जवाब देने वाला नहीं. 
मैनें भी उसको कुछ यूं जवाब दिया, जो आपको बताता हूं. 

हमारा देश महान है
इसका क्या गुणगान है
सरल जिसकी जुबान है
तहजीब भी आसान है.

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

हर बाला देवी प्रतिमा
हर बालक भगवान है
नदी जहां पर माता है
जिसे पूजे हर इंसान है

और कहूं तो 
घर-घर बसता हिंदुस्तान है. 

हर धर्म यहां पर चलता
दिल में दिखता ईमान है
हर पर्व यहां पर मनता
उत्साह का आसमान है

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

गोली यहां सैनिक खाता
शहादत उनकी महान है
फिर भी मां यही कहती
मेरा बेटा देश का सम्मान है

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.



ईसाई-मुस्लिम संग रहते
भगवान का होता गुणगान है
मंदिर में भजन-आरती गूंजे 
मस्जिद से गूंजती अजान है

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

Saturday, April 28, 2018

खुशियों की खुदकुशी का नगर कुशीनगर

शीर्षक पढऩे के बाद आपका जेहन सीधे कुशीनगर के उस ट्रेन हादसे की तरफ मुड़ जाएगा, जिसमें 13 मासूमों की मौत हो गई. वीभत्स नजारा था. लापरवाही थी. संवेदनहीनता भी कही जाएगी. ड्राइवर से लेकर प्रशासन तक की. अब चौराहे पर उतरे हैं. सड़कों पर शोर है. सख्ती है. होनी भी चाहिए. लेकिन मामला आज ट्रेन हादसे का नहीं. जिक्र किसी और बात का है. उक्त हादसा तो एक ड्राइवर की लापरवाही से हुआ, लेकिन दूसरा जो हादसा हम बताने जा रहे हैं, वह संवेदनहीन की पराकाष्ठा का और पार करता हुआ नजर आता है. जानकर भी बाप अपने बेटे की गलती को दरकिनार कर देता है, लेकिन आज का निष्ठुर जमाना बेटे को शायद यह इजाजत नहीं देता है. बेटा जानता है कि यह मेरा पिता है. शरीर से सिर्फ हाड़ है. दिमाग सोचने का सामथ्र्य खो चुका है, और अर्थ. अर्थ की तो इसके बाद बात ही नहीं की जा सकती है, लिहाजा जिस बेटे की शक्ल देखकर वह सांसे लिया करता था, वही बेटा आज अपने बाप की शक्ल सिर्फ घर में देखकर आगबबूला हो उठा. आगे क्या हुआ, इसके लिए हमारे गेस्ट राइटर योगेश मिश्रा जी की मेरठ से कुशीनगर की स्पेशल न्यूज पर फोकस करिए...



पिता गिड़गिड़ाता रहा, बेटे पीटते रहे 
उसका पिता उससे रहम की भीख मांग रहा था, लेकिन बेटा बेदर्द होकर अपने ही बाप पर डंडे बरसा रहा था, वो पिता जिसने जिंदगी के हर मोड़ अपने बेटे की खुशियों के लिए सबकुछ न्यौछावर कर दिया था. जी हां आज के समाज की यह तस्वीर है जिसे हम और आप सभ्य समाज के रूप में परिभाषित करते हैं. संसाधनों के इस युग में संवेदनाएं कितनी सिमट गई है. यूपी के कुशीनगर जिले की ये तस्वीरें सवाल उठा रही हैं. वाकई क्या आज के समाज का ताना-बाना इतना कमजोर हो गया है, कि एक बेटा अपने पिता पर डंडे बरसाने से भी नहीं चूकता है. आइए जरा इस कहानी को समझते है.ं

पिता को ही घर से निकाला 
बताते हैं कुशीनगर जिले के नौका टोला इलाके में नुरूल इस्लाम उर्फ हत्थू के दो बेटे हैं. जब उनके शरीर में ताकत रही तो उन्होंने अपने बेटों को कोई कमी नहीं होने दी. लेकिन उम्र के अंतिम पड़ाव में दोनों बेटों ने ही उनको घर से निकाल दिया. चार साल पहले उन्हें दोनों बेटों-मोनू व रहीम ने घर से भगा दिया था. हालांकि हत्थू की दिमागी हालत ठीक नहीं है, बीते दिनों जब हत्थू अपने घर आया तो उनके बेटों ने उसे रस्सी से बांधकर सड़क पर डंडों से पिटाई कर दी. हालांकि इस दौरान आसपास के लोग बचाने भी आए, लेकिन बेरहम बेटा अपने बाप को पीटता रहा.

Saturday, November 4, 2017

भले ही फाइटर मत उतारिए, पर सफर सुरक्षित करिए




लखनऊ को आगरा से जोडऩे वाले लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे के लिए 24 अक्टूबर का दिन ऐतिहासिक भरा रहा. तेज रफ्तार मार्ग में लड़ाकू और परिवहन वाहनों के टच डाउन करने का एक अध्याय और जुड़ गया. इससे पहले भी 2015 में मथुरा के पास यमुना एक्सप्रेस-वे पर वायुसेना के लड़ाकू विमान मिराज-2000 टच डाउन करके उड़े थे. यानी यूपी की सरजमीं पर सियासत की महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षा परिणति स्वरूप बने दोनों ही एक्सप्रेस-वे अब वायुसेना के विमानों को उतारने के काबिल हैं. आसमानी सेना का यह अभ्यास जरूरी होने के पीछे बड़ा तर्क यह है कि देश में विपरीत परिस्थितियों या युद्ध सरीखे हालातों पर विमानों को उतारने के लिए एक नया विकल्प देश-प्रदेश के पास उपलब्ध है.

बेशक यह खुशी की बात है. 
हमें यह गुरूर भी होना चाहिए. 
सियासतदां को इतराना भी चाहिए.
सरकारों का सीना 56 इंच का होना चाहिए.
कि इतना लंबा और कई शहरों के फासले को कम करने वाला हाईवे अब हमारी झोली में है.
लेकिन, 
जरा ठहरिए, सोचिए और संभलिए.
कि क्या फर्राटे भरवाने वाले हाईवे पर आप सुरक्षित हैं. आपकी जिंदगी को कोई जोखिम नहीं है. नहीं, कतई नहीं. यह कहना गलत होगा. यह एक्सप्रेस-वे जिंदगियों को बेहिसाब तरीके से लील रहे हैं. खुद एक्सप्रेस-वे को मंजूरी देने वाले केंद्रीय और राज्य के विभागों के आंकड़े इस बात के गवाह हैं. एनसीआरबी के आंकड़ें उठाएं या फिर पीआईबी द्वारा रिलीज सेंट्रल मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाईवेज की रिपोर्ट पर आंखें गड़ाई जाएं. तो निश्चित तौर पर आंखें फटी रह जाएंगी. 
यमुना एक्सप्रेस-वे की ही बात करें तो अगस्त 2012 से लेकर अब तक 4000 से ज्यादा एक्सीडेंट यहां हो चुके हैं. 2012 के 275 हादसों में 33, 2013 के 896 हादसों में 218, 2014 के 771 हादसों में 127, 2015 के 919 हादसों में 142 और 2016 के 1193 हादसों में 128 मौतें हो चुकी हैं. 2017 में भी मौत का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है. अभी हाल ही में 3 नवंबर 2017 को स्कूली बच्चों से भरी हिमाचल प्रदेश से आ रही बस का टायर फटने से ड्राइवर की मौत हुई. इसमें 30 बच्चे घायल हुए और आधा दर्जन से ज्यादा स्टाफ को गहरी चोटें आईं. एक दिन पहले ही आगरा शहर के एक युवा कारोबारी ने ड्राइवर समेत इसी एक्सप्रेस-वे पर दम तोड़ दिया. अब सीधे तौर पर यह कहना जरूरी भी हो गया है कि एक तरफ तो सरकार इन एक्सप्रेस-वे पर फाइटर प्लेन को उतार रही है और दूसरी ओर उन्हीं एक्सप्रेस-वे पर सवारी वाहन ही सुरक्षित तरीके से नहीं दौड़ पा रहे हैं. 





मुश्किल इतनी भर नहीं है, एक्सप्रेस-वे न सिर्फ मौत के रास्ते साबित हो रहे हैं बल्कि लोगों को उनकी मंजिल तक भी नहीं पहुंचा पा रहे हैं. जिस उददेश्य के लिए यह हाईवे बनाए गए, मसलन इन पर फर्राटे भरते हुए कम समय में एक लंबी दूरी को तय किया जा सकता है, वह भी उददेश्य तमाम जिंदगियों का अधूरा ही रह जाता है. और ऊपर से सरकार देश भर में इसी तरह के एक-दो नहीं बल्कि 22 एक्सप्रेस-वे बनाने का दावा कर रही है. और सभी एक्सप्रेस-वे पर फाइटर प्लेन उतारने का भी दंभ भर रही है. इनमें दिल्ली-मुरादाबाद, दिल्ली-मेरठ और मुंबई-पुणे सरीखे कई एक्सप्रेस-वे शामिल हैं. लेकिन इससे इतर होकर यदि हम इन एक्सप्रेस-वे पर सुरक्षित सफर की बात करते हैं तो वह कहीं होता दिखता नहीं है. बेशक यह युद्ध और आपातकाल की दृष्टि से उचित हो सकता है, लेकिन दोनों ही परिस्थितियां गाहे-बगाहे कई दशकों में एक या दो बार ही आती हैं. चीन और पाकिस्तान से विवाद इतने चरम पर हैं, फिर भी युद्ध जैसे हालात नहीं बनते दिख रहे हैं.
दूसरी तरफ, पीआईबी द्वारा केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की रिपोर्ट को ही लीजिए. ज्यादा दूर नहीं सिर्फ 2016 के आंकड़े ही उठा लीजिए. इस साल 4 लाख 80 हजार से अधिक एक्सीडेंट सड़कों पर हुए, और उनमें एक लाख 50 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई. इतना ही नहीं इन हादसों में मरने वाले 83 फीसद लोग 18 से 65 आयु वर्ग के थे. जबकि 18 साल से कम आयु वर्ग के सात फीसदी किशोरों को इन हाई स्पीड सड़कों ने लील लिया. चार लाख से अधिक हादसों में पांच लाख लोग घायल भी हुए. अब इसे क्या कहा जाएगा. यह दु:ख की बात है. 
सरकारों और उसमें बैठे जिम्मेदारों को मानव सुरक्षा के प्रति गंभीर होना पड़ेगा. 
उन्हें सफर कराएं, 
तेज कराएं, 
कम दूरी का कराएं. 
अच्छी बात है, लेकिन 
सुरक्षित कराएं, 
सहूलियत भरा कराएं,
सुकुन से घर पहुंचाएं, 
समय से कराएं, 
यह और भी अच्छा रहेगा. 
सरकार के लिए.


गौरव लहरी.

Monday, September 4, 2017

सौ पंखुरियों के कमल हैं कान्हा



भारतीय सभ्यता और समाज में भगवान श्रीकृष्ण की अपनी अलग ही मान्यता है. वात्सल्य और योग की प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले कृष्ण दो युग से पूजे जा रहे हैं. उनकी कथा या गाथाएं हमने श्रद्धाभाव से सुनी हैं. कभी-कभी कृष्ण चरित्र तमाम बहस का मुद्दा भी बने हैं. मगर आस्था और आलोचना से अलग तार्किकता के आधार पर हमने कृष्ण को समझने की कोशिश कम ही की है. 

                                    
कृष्ण अंतत: क्या है? 
रह-रहकर यह सवाल उठता है. क्या है उनकी संपूर्ण यात्रा....
आइए एक मानव से महामानव और परमेश्वर की संज्ञा से परिभाषित श्रीकृष्ण के सफर पर चलते हैं और भगवान श्रीकृष्ण की तलाश करते हैं. 
विश्व संस्कृति के इतिहास में मात्र श्रीकृष्ण ऐसे हैं, जिनकी जीवन यात्रा कारागार से आरंभ होकर कल्पतरू तक बनी. सभी तरह के हारे, घबराए, जीवन से निराश लोगों को साहस, आत्मविश्वास और वत्सल छांव प्रदान करती है. कृष्ण के बारे में सोचें...
जिसके जन्म लेने से पूर्व ही सत्ताधारियों ने उसकी हत्या करने का कुचक्र रच डाला था. 
जिसे धरती छूते ही उसकी मां की गोदी से छीन लिया था. 
आज जब चिकित्सा विज्ञान यह दावा करती है कि कोख से जन्म लेने के आधा घंटे के भीतर मां का स्तनपान शिशु को पौरूषत्व प्रदान करता है, उस दौर में देवकी के हृदय के टुकड़े को छीनकर जन्म के चंद क्षणों बाद ही वासुदेव ने उफनती कालिंदी को पार कराया. अर्थात बृज क्षेत्र का माखनचोर कृष्ण को अपनी असल मां का दूध तक पीने को नहीं मिला था. 


सारे मिथक, इतिहास लोकगाथाएं खंगाल लें. कहां मिलेगा आपको कृष्ण सा जन्मजात आउटसाइडर. गर्भ के अंधकार से यूं बाहर फेंके गए हम सभी रोएं हैं, कृष्ण कई लोगों के आंसुओं का कारण लेकर पैदा हुए. 
शायद ही कोई होगा, ऐसा लड़खड़ाकर चलने वाला बच्चा, जिसे सुनना पड़ा यह ताना कि तू गोरा नहीं काला है. यशोदा, उसकी मां नहीं, उसने तो बस उसे पाला है. दुधमुंही उम्र और इतना जहर आसपास. कोई और होता तो कच्ची उम्र में न्यूरॉटिक हो जाता. या क्या पाता नंदमहल की खिड़की से यमुना में छलांग लगा देता. आज की युवा पीढ़ी और बालमन यह ध्यान रखे कि कृष्ण ने वह सब नहीं किया. 



आयु बढऩे के साथ-साथ कृष्ण ने साहसिक कदम उठाया. इतना साहसिक कि इंद्रपूजा का विरोध तक कर डाला. वर्षा जब धरासार होने लगी तो ब्रजवासियों के लिए गोवर्धन पर्वत उठाकर कृष्ण ने छत्ररक्षक की भूमिका निभाई. 


श्रीकृष्ण चरित का निहितार्थ समझें. इंद्रियों का अर्थ गमन या गो. एक बार पहाड़ उठा ले कोई, डूबने से बचा ले अपनों को, तो समझिए कि इंद्रियां सध गईं. उनके साथ काल के प्रवाह में बहने की जगह उन्हें ऊध्र्वमुखी करने को रास कहा जाएगा. अब कृष्ण के आंतरिक प्रभाव की ओर मुड़ें. जब ब्रज की गोपियां भरमाई सी जिंदगी जीने लगीं, तब  एक-एक गोपी के वास्ते कृष्ण रास के व्यसन में डूब गए. यमुना की रेत, मयूर की तान, गौ के चारे, दही की मटकी, चूल्हे की आग, राख, धड़कन, सांस, नींद, आंगन, पानी. एक-एक रंग में इंद्रधनुष. कहां-कहां कृष्ण नहीं दीख पड़े थे. 


मथुरा पहुंचे श्रीकृष्ण को जीवन की कई त्रासदी झेलनी पड़ी थीं. जरासंध का हमला, कालयवन से प्राण बचाने की नौबत, भिक्षा मांगकर खाना. कई ऐसे प्रसंग जो कृष्ण के जीवन को संघर्ष से भरपूर बनाते हैं. कुरूक्षेत्र के मैदान में अर्जुन जब युद्ध लडऩे से इनकार कर देता है, अपनों को सामने देख शस्त्र गिरा देता है. तब श्री कृष्ण के मुख से गीता के रूप में वाणी प्रखर हुई. जो आज की रहस्य ग्रंथ मानी जाती है.




भ्रष्ट सत्ताधीशों को उखाड़ फेंकने की कला भी श्रीकृष्ण ने सिखाई. आधुनिक युग की मैनेजमेंट टेक्नीक को भी पहले-पहल श्रीकृष्ण ने ही समझा. उन्होंने युधिष्टर से जहां अश्वात्थामा कहलवाया, वहीं भीम के समक्ष शिखंडी को लाकर खड़ा कर दिया. जिसे आजकल के लोग कूटनीति कहते हैं. जयद्रथ वध उनके दूरदृष्टा का परिचय देने के साथ आधुनिक युग शब्दावली का आपदा प्रबंधन कहलाता है. देह छोडऩे के पूर्व श्रीकृष्ण ने जराव्याध को क्षमा दी थी. इसके साथ स्वर्ग और सुख प्रदान किया. इसीलिए श्रीकृष्ण के रूप और व्यक्तित्व को परिभाषित करना असंभव है. 

अब जरा विचार करें कि यदि श्रीकृष्ण न होते तो ललित कलाओं का क्या होता. इतिहास गवाह है कि हर कला की धुरी श्रीकृष्ण पर टिकी है. श्रीकृष्ण योगेश्वर भी हैं और ढेरों विरोधी के संगम भी. हम सभी उनकी भक्ति में लीन हैं. उनके जैसा चरित्र खोजने की कल्पना करना भी बेमानी भरा है. क्योंकि कान्हा सौ पंखुरियों के कमल हैं.

Sunday, August 27, 2017

'मोक्ष' दिलाते बाबा



डेरा सच्चा-सौदा सिरसा के चीफ गुरमीत सिंह का जिक्र आज हर जुबान पर है. बच्चा, बूढ़ा, नौजवान उनकी करतूतों पर शर्मिंदगी महसूस कर रहा है. 'नाम चर्चा' की जगह निंदा चर्चाओं ने ले रखी है. कुछ यही आकलन दैनिक जागरण-आई नेक्स्ट में सीनियर न्यूज एडीटर उमंग मिश्रा  ने किया है. मजहबी आस्था के नाम पर लोगों के जज्बातों के साथ जिस तरह से खिलवाड़ हो रहा है, उसी को विस्तार से समझाने की कोशिश उन्होंने अपने आलेख में की है. उन्होंने इस तथ्य पर जोर ज्यादा दिया है कि 'बात सिर्फ राम-रहीम तक सीमित नहीं है. गद्दी को गुरू मानने की प्रथा व्यापक है. जो भी उसक पर बैठेगा, उसे गुरू मान लेंगे. भाई लकड़ी और धातु से बनी सिंहासननुमा कुर्सी ही तो है, उस पर निर्जीव चीज में क्या प्रभाव हो सकता है कि कोई भी अज्ञानी उस पर बैठ जाए और सबका गुरू बन जाए. गुरू तो कोई तब है, जब वो ज्ञान दे सके'.


संलग्न : -
27 अगस्त को दैनिक जागरण-आई नेक्स्ट के अंक में प्रकाशित आलेख की कॉपी.

Thursday, August 24, 2017

युद्ध में सक्षम तो शांति का पक्षधर भी है भारत 

भारत और चीन में आर्मी वॉर से पहले 'कमेंट वॉरÓ छिड़ा हुआ है. चीनी मीडिया लगातार भारत को युद्ध की धमकियां दे रहा है, तो भारत की तरफ से भी 'जवाबी फायरिंगÓ चल रही है. हालांकि 'ग्लोबल टाइम्सÓ में रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों ही देश 1962 की तुलना में बेहद मजबूत हैं. चीन तो क्या, यह बात हर कोई जानता है कि अब लड़ाई किसी देश के बूते की बात नहीं है. सच्चाई यह है कि भारत, अमेरिका और जापान की दोस्ती चीन को रास नहीं आ रही है, लिहाजा वह दबाव बनाने के लिए यह सब कर रहा है, ताकि इस क्षेत्र में उसका दबदबा कायम रहे. इधर, गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दुनिया के किसी भी मुल्क में भारत पर आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं है, सरीखा तल्ख बयान देकर चीन को चेताया है. बेशक उन्होंने इस मसले का हल सकारात्मक तरीके से निकालने की पहल भी यह कहकर की है कि भारत ने कभी किसी पर हमला नहीं किया, लेकिन देश की सुरक्षा पर आंच न आने की बात कहकर अपनी युद्धनीति की मंशा भी जता दी है. वहीं, रक्षा मंत्रालय ने युद्ध की स्थिति से निपटने के लिए व्यापक कदम उठाए हैं. रक्षा मंत्रालय ने रविवार को सेना की जरूरतों के अनुरूप परिणाम के लिए बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) में आमूल-चूल परिवर्तन का फैसला लिया है. यह फैसला डोकलाम में भारत और चीन की सेना में तनातनी को देखते हुए लिया है. रक्षा मंत्रालय ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारों के अतिरिक्त सरकार ने बीआरओ के महानिदेशक (डीजी) को 100 करोड़ रुपये तक की खरीदारी का वित्तीय अधिकार दिया है. इसके अलावा बीआरओ को सड़क परियोजनाओं के लिए बड़ी निर्माण कंपनियों को शामिल करने का फैसला लेने की भी मंजूरी दी है. इस तरह भारत चीन से मुकाबला करने के लिए हर उस रक्षा नीति पर जोर दे रहा है, जो उसे युद्ध के हालातों में सफल और सक्षम करेगी. लिहाज़ा इस बात को समय रहते हुए चीन जितनी जल्दी समझ ले तो बेहतर रहेगा।