यह खुशी का अवसर है. गर्व करने का वक्त है. वजह है, स्वदेशी एंटी-पनडुब्बी जहाज आईएनएस किलटन का भारतीय नौसेना में शामिल होना. 'मेक इन इंडिया' के जरिए, यह हमारे लिए जरूरी ही नहीं अनिवार्य भी है. सैन्य ताकत का बढऩा इसलिए भी जरूरी और लाजिमी हो जाता है क्योंकि दुनिया भर में, विशेष तौर पर पश्चिमी देशों में भारत का कद लगातार बढ़ रहा है. यह बढ़ता कद चीन और पाकिस्तान सरीखे देशों को रास नहीं आ रहा है. वह लगातार भारत की कूटनीति, सैन्य ताकत और अर्थनीति को छिन्न-भिन्न करने की नाकाम कोशिशों में जुटे हैं. डोकलाम विवाद हो या फिर जम्मू और कश्मीर में आतंकी हमलों का मसला. दोनों ही स्थितियों में चीन और पाकिस्तान को भारत के साथ-साथ अन्य देशों का भी दबाव झेलना पड़ा है. अब जब नौ सेना में आईएनएस किलटन सरीखा युद्धपोत शामिल हो गया है तो समुद्री सीमा की रक्षा में नौसेना को काफी मदद मिलेगी. बंगाल की खाड़ी और दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप को रोकने में अमेरिका की अप्रत्यक्ष तरीके से मदद होगी. इससे न सिर्फ विस्तारवादी नीति को अपनाए बैठा चीन हतोत्साहित होगा, बल्कि उसे भारत की तरफ न चाहकर भी सकारात्मक रूख अपनाना पड़ेगा. क्योंकि आईएनएस किलटन दुश्मन की पनडुब्बी तक को तहस-नहस करने की ताकत रखता है. इसके अलावा यह शिपयार्ड अत्याधुनिक हथियारों और सेंसर से युक्त है. इसमें हेवीवेट टॉरपीडो, एएसडब्ल्यू रॉकेट, 76 एमएम कैलिबर मिडियम रेंज बंदूक और दो बहु बैरल 30 एमएम बंदूकें शामिल हैं. फायर कंट्रोल सिस्टम, उन्नत ईएसएम (इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर) सिस्टम, सबसे उन्नत सोनार और रडार को इंस्टॉल किया है. इधर, सोमवार को रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन की मौजूदगी में 'भारतीय नौसेना की बढ़ रही शक्ति को दर्शाने के लिए शामिल किया है किलटन' बयान देकर सेना ने पड़ोसी देशों के चेहरे पर चिंता की लकीरें जरूर खींच दी हैं. एक खास बात और है कि किलटन बनाने के सफल प्रयोग के बाद देश के इंजीनियरों ने दूसरे देशों की 'निर्भरता' को खत्म कर दिया है. हालांकि जहाज में आगे चलकर कम दूरी के एसएएम सिस्टम को लगाया जा सकेगा और एएसडब्ल्यू हेलीकॉप्टर को उतारा जा सकेगा. लेकिन फिर भी यह भारतीय जहाज रुस में बने उस जहाज की विरासत का दावा करता है, जो 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान 'ऑपरेशन ट्राइडेंट' में उपयोग में लाया गया था. लिहाजा पड़ोसी देशों युद्धवादी नीति बदलकर दोस्ताना नजरिया अपनाना होगा.
Monday, October 16, 2017
Thursday, August 24, 2017
युद्ध में सक्षम तो शांति का पक्षधर भी है भारत
भारत और चीन में आर्मी वॉर से पहले 'कमेंट वॉरÓ छिड़ा हुआ है. चीनी मीडिया लगातार भारत को युद्ध की धमकियां दे रहा है, तो भारत की तरफ से भी 'जवाबी फायरिंगÓ चल रही है. हालांकि 'ग्लोबल टाइम्सÓ में रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों ही देश 1962 की तुलना में बेहद मजबूत हैं. चीन तो क्या, यह बात हर कोई जानता है कि अब लड़ाई किसी देश के बूते की बात नहीं है. सच्चाई यह है कि भारत, अमेरिका और जापान की दोस्ती चीन को रास नहीं आ रही है, लिहाजा वह दबाव बनाने के लिए यह सब कर रहा है, ताकि इस क्षेत्र में उसका दबदबा कायम रहे. इधर, गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दुनिया के किसी भी मुल्क में भारत पर आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं है, सरीखा तल्ख बयान देकर चीन को चेताया है. बेशक उन्होंने इस मसले का हल सकारात्मक तरीके से निकालने की पहल भी यह कहकर की है कि भारत ने कभी किसी पर हमला नहीं किया, लेकिन देश की सुरक्षा पर आंच न आने की बात कहकर अपनी युद्धनीति की मंशा भी जता दी है. वहीं, रक्षा मंत्रालय ने युद्ध की स्थिति से निपटने के लिए व्यापक कदम उठाए हैं. रक्षा मंत्रालय ने रविवार को सेना की जरूरतों के अनुरूप परिणाम के लिए बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) में आमूल-चूल परिवर्तन का फैसला लिया है. यह फैसला डोकलाम में भारत और चीन की सेना में तनातनी को देखते हुए लिया है. रक्षा मंत्रालय ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारों के अतिरिक्त सरकार ने बीआरओ के महानिदेशक (डीजी) को 100 करोड़ रुपये तक की खरीदारी का वित्तीय अधिकार दिया है. इसके अलावा बीआरओ को सड़क परियोजनाओं के लिए बड़ी निर्माण कंपनियों को शामिल करने का फैसला लेने की भी मंजूरी दी है. इस तरह भारत चीन से मुकाबला करने के लिए हर उस रक्षा नीति पर जोर दे रहा है, जो उसे युद्ध के हालातों में सफल और सक्षम करेगी. लिहाज़ा इस बात को समय रहते हुए चीन जितनी जल्दी समझ ले तो बेहतर रहेगा।
Monday, August 21, 2017
भारत को आगे कर चीन और उत्तर कोरिया को रोक रहा अमेरिका
चीन विस्तारवादी नीति अपनाए हुए है. आक्रामकता उसकी फितरत है. चीन का यह रवैया 'दुनिया के दादाÓ अमेरिका को रास नहीं आ रहा. खुद अमेरिका के प्रशांत क्षेत्र के सैन्य कमांडर एडमिरल हैरी हैरिस ने यह स्वीकार किया है. अमेरिकी सैन्य कमांडर हैरिस चीन की करतूतों की तुलना आतंकवाद से कर रहे हैं. वजह साफ है, दरअसल, चीन और उत्तर कोरिया के आक्रामक तेवर अमेरिका को टेंशन दिए हुए हैं. इसीलिए बार-बार उत्तर कोरिया का उकसावे भरी धमकी और प्रशांत क्षेत्र में दक्षिण चीन सागर पर चीन की बढ़ती सैन्य ताकत, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को आक्रामक तेवर बनाए रखने के लिए मजबूर किए हुए है. बता दें कि प्रशांत क्षेत्र के अंतर्गत चीन और उत्तर कोरिया दोनों ही देश आते हैं. इस पर अमेरिकी सैन्य व्यवस्था है, लिहाजा अमेरिका के एडमिरल हैरी हैरिस ने भविष्य में टकराव की आशंका जताई है. साथ ही दोनों देशों से सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर निपटने के लिए अमेरिका ने भारत को खड़ा कर दिया है. तभी तो एडमिरल हैरिस ने भारत की सैन्य ताकत का भरोसा दिलाया है. दक्षिण एशिया में चीन का वर्चस्व कम करने के लिए अमेरिका भारत को आगे करके अपनी लकीर बड़ी रखना चाहता है. जो न सिर्फ भारत के लिए फायदेमंद है, बल्कि भारत से जुड़े सीमा विवादों और पड़ोसी मुल्कों से मधुर संबंध बनाने में भी कारगर है. फिर चाहे भारत में संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण हो या अत्याधुनिक हथियार की मांग, अमेरिका खुलकर भारत को समर्थन दे रहा है. क्योंकि, आज फिलीपिंस जो आतंक का दर्द झेल रहा है, और अमेरिका उस पर सैन्य कार्रवाई के जरिए मल्हम लगा रहा है, वही जख्म भारत को परेशान किए हुए है. आंतकी घुसपैठ, हमले और निर्दोषों की हत्याएं, भारत में भी कम नहीं है, लेकिन यह सुकून की बात है कि दो महाशक्ति एक प्लेटफार्म पर खड़े होकर दुनिया बचाने की जंग लडऩे को तैयार हैं, जो दोनों के भविष्य के लिए बेहतर है.