भारत और चीन में आर्मी वॉर से पहले 'कमेंट वॉरÓ छिड़ा हुआ है. चीनी मीडिया लगातार भारत को युद्ध की धमकियां दे रहा है, तो भारत की तरफ से भी 'जवाबी फायरिंगÓ चल रही है. हालांकि 'ग्लोबल टाइम्सÓ में रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों ही देश 1962 की तुलना में बेहद मजबूत हैं. चीन तो क्या, यह बात हर कोई जानता है कि अब लड़ाई किसी देश के बूते की बात नहीं है. सच्चाई यह है कि भारत, अमेरिका और जापान की दोस्ती चीन को रास नहीं आ रही है, लिहाजा वह दबाव बनाने के लिए यह सब कर रहा है, ताकि इस क्षेत्र में उसका दबदबा कायम रहे. इधर, गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दुनिया के किसी भी मुल्क में भारत पर आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं है, सरीखा तल्ख बयान देकर चीन को चेताया है. बेशक उन्होंने इस मसले का हल सकारात्मक तरीके से निकालने की पहल भी यह कहकर की है कि भारत ने कभी किसी पर हमला नहीं किया, लेकिन देश की सुरक्षा पर आंच न आने की बात कहकर अपनी युद्धनीति की मंशा भी जता दी है. वहीं, रक्षा मंत्रालय ने युद्ध की स्थिति से निपटने के लिए व्यापक कदम उठाए हैं. रक्षा मंत्रालय ने रविवार को सेना की जरूरतों के अनुरूप परिणाम के लिए बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) में आमूल-चूल परिवर्तन का फैसला लिया है. यह फैसला डोकलाम में भारत और चीन की सेना में तनातनी को देखते हुए लिया है. रक्षा मंत्रालय ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारों के अतिरिक्त सरकार ने बीआरओ के महानिदेशक (डीजी) को 100 करोड़ रुपये तक की खरीदारी का वित्तीय अधिकार दिया है. इसके अलावा बीआरओ को सड़क परियोजनाओं के लिए बड़ी निर्माण कंपनियों को शामिल करने का फैसला लेने की भी मंजूरी दी है. इस तरह भारत चीन से मुकाबला करने के लिए हर उस रक्षा नीति पर जोर दे रहा है, जो उसे युद्ध के हालातों में सफल और सक्षम करेगी. लिहाज़ा इस बात को समय रहते हुए चीन जितनी जल्दी समझ ले तो बेहतर रहेगा।
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