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Monday, July 30, 2018

यह भी संभव है कि शायद हार को हरा दूं...


जोखिम भरा सफर तय करना वाकई कठिन है। कदम-कदम पर मुश्किलों का सबब बनना पड़ता है। जरूरी नहीं कि आप जो फैसला लेकर जिंदगी की राह तय करने जा रहे हैं, वह आपको आपकी मंजिल तक पहुंचाएगी, लेकिन यह भी एक तथ्य सच के बेहद करीब है कि सतत प्रयास और मेहनत के साथ जोखिम उठाने वालों को ही सफलता मिलती है। जुलाई का महीना खत्म होने को है। एक महीने पहले अागरा से हिसार आया था। नई जॉब थी, तो जाहिर तौर पर नया उत्साह और उमंग भी हिलोरे ले रहीं थीं। जॉब वर्क शुरू हुआ। मिनट से घंटे, घंटों से दिन और दिनों से चार हफ्ते कब गुजर गए पता नहीं चला। सरलता से नहीं गुजरे यह दिन। अब भी नहीं गुजर रहे। मन खिन्न रहता है और तन थका हुआ। दिमाग दिन भर उधेड़बुन में लगा रहता है। विचारों का द्वंद्व जेहन में इस कदर दौड़ता है, जैसे किसी व्यस्त रेलवे स्टेशन पर भीड़ का हाल रहता है। नींद-चैन उजड़ चुका है। सब कुछ बेचैन है, सिवा एक बात के। तसल्ली अपनी आर्थिक स्थिति सुधरने की बनी हुई है। यह एक तथ्य सारे झंझावतों को हर दिन नई ऊर्जा देने का कारण बना हुआ है। लेकिन धन के चक्कर में अपना तन-मन सारा दांव पर लगा देना कहां तक उचित है, यह समझ नहीं आता।


एक तरफ मुझे अपनी मंजिल तक पहुंचने की हड़बड़ाहट बनी हुई है तो दूसरी ओर अपनों से पीछे छूटने की घबराहट भी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही। कहते हैं कि मंजिल पाने से बेहतर आनंद तो सफर का होता है, लेकिन यहां हालात विपरीत हैं। यह भी एक व्यवहारिक तथ्य है कि नई नौकरी में आपके समक्ष चुनौतियां अधिक और बेहतर परिणाम कम रहते हैं। विपरीत परिस्थितयों को अपने अनुकूल बनाना ही आपकी क्षमता को दर्शाता है। और किसी विद्वान ने कहा भी है कि आप अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करें यह कोई साहस की बात नहीं है बल्कि अपनी क्षमता से आगे जाकर कोई कार्य करें और उसमें सफलता मिलते तो साहस कहलाता है। बस इन्हीं सफलता भरे मंत्रों को सुनकर, पढ़कर और देखकर अपने आप को जी रहा हूं। देखता हूं कब तक हार से हार मिलेगी। यह भी संभव है कि शायद हार को हरा दूं...

Monday, May 7, 2018

और कहूं तो...

घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

मेरे विदेशी मित्र ने मुझसे एक बार पूछा कि आपका देश क्या है, आप कहां रहते हो? 
सवाल सीधा था, सरल था, पर शायद जवाब देने वाला नहीं. 
मैनें भी उसको कुछ यूं जवाब दिया, जो आपको बताता हूं. 

हमारा देश महान है
इसका क्या गुणगान है
सरल जिसकी जुबान है
तहजीब भी आसान है.

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

हर बाला देवी प्रतिमा
हर बालक भगवान है
नदी जहां पर माता है
जिसे पूजे हर इंसान है

और कहूं तो 
घर-घर बसता हिंदुस्तान है. 

हर धर्म यहां पर चलता
दिल में दिखता ईमान है
हर पर्व यहां पर मनता
उत्साह का आसमान है

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

गोली यहां सैनिक खाता
शहादत उनकी महान है
फिर भी मां यही कहती
मेरा बेटा देश का सम्मान है

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.



ईसाई-मुस्लिम संग रहते
भगवान का होता गुणगान है
मंदिर में भजन-आरती गूंजे 
मस्जिद से गूंजती अजान है

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

Monday, March 19, 2018

सब में रब और रब में राम - 1



एक थे 'वेद व्यास जीÓ. महाभारत काल का उन्होंने वर्णन किया था. धर्म ग्रंथों और स्कूली किताबों में भी इस तथ्य की पुष्टि होती है. और आज कलयुग है. त्रेता के राम को एक नए 'वेद व्यास जीÓ ने नए सिरे से गढ़ दिया है. अपने ओजपूर्ण और जज्बाती तेवरों के साथ उन्होंने जो यह गगनभेदी धर्मगान गाया है, वह आखिर क्या है? समझ नहीं आता, वह कहते हैं कि ...

मैं हिंदू जगाने आया हूं, मैं हिंदू जगाकर जाऊंगा 
मरते दम तक अपने मुख से जय श्री राम गाऊंगा 

..तो क्या आज तक हिंदू जागा हुआ नहीं था. क्या अब तक हिंदू कुम्भकर्णी नींद सोया हुआ था. क्या आपके जगाने से ही हिंदू की रगों में खून दौड़ेगा और उनके मुख से 'जयश्रीरामÓ सरीखा नारा निकलेगा.
शायद नहीं. बल्कि बिलकुल नहीं, और मेरी नजर से तो कतई नहीं.
वजह है, वो भी बड़ी. हिंदू कोई कुम्भकर्ण नामक व्यक्ति नहीं है. जो छह महीने सोता है और छह महीने अपने जीवन यापन के लिए जरूरी संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल करता है. बल्कि हिंदू एक विचारधारा है. एक सभ्यता है. जो आत्म शंाति की तरफ ले जाने के लिए अध्यात्म का रास्ता चुनती है और आत्मा का परमात्मा में मिलन कराती है.

अब जिक्र इसी धर्मगान के दूसरे अंतरे का... 

दमक रहीं तलवारें सबकी, चमक रहा त्रिशूल है
हिन्दू को कमजोर न समझे, ये दुश्मन की भूल हैं

...जरा मुझे बताइए कि क्या हिंदुओं ने पहले कभी तलवारें नहीं उठाई हैं. जो अब तलवारें लहराने और उनको चमकाने की बात कही जा रही है. बल्कि जब-जब धर्म की हानि हुई है, हिंदू ही जागा है और उसने आगे बढ़कर धर्म की रक्षा की है. क्या आपके बताने से त्रिशूल और तलवारें चमकेंगी. त्रेता में भगवान श्रीराम धनुष और द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र नहीं उठाया था. कलियुग में क्यों हिंदुओं के बलिदानों को भूल जाते हो. मंगल पांडे, भगत सिंह और चंद्रशेखर, आखिर हिंदू ही तो थे. लिहाजा दुश्मन यह भली भांति जानता है कि यह समाज अपने आप में परिपूर्ण सामथ्र्य और वतनपरस्ती रखता है.

अब जिक्र इसी धर्मगान के तीसरे अंतरे का 

सब में रब और रब में राम
मिलकर बोलो जय श्री राम

 यह लाइन गाते वक्त शायद 'व्यास जीÓ भूल गए कि वह खुद ही हिंदु-मुस्लिम के एकजुट होने की बात अप्रत्यक्ष तौर पर कर गए. क्योंकि उन्होंने खुद कहा कि सब में रब, यानी हर एक व्यक्ति में रब समाया हुआ है, फिर क्या हिंदु और क्या मुस्लिम. सिर्फ 'व्यास जीÓ ने ही रब में भेद कर दिया. रब में राम कहकर. उन्होंने रब को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया. जबकि छोटी क्लासों के बच्च्े भी जानते हैं कि जब वह राम और रमजान लिखेंगे तो दोनों के शुरूआती शब्द 'रामÓ ही लिखे जाएंगे. लिहाजा मिलकर 'जयश्रीरामÓ बोला जाए तो मिलकर 'अल्लाह हो अकबरÓ बोलना भी इस देश की तहजीब में आता है.

अब जिक्र इसी धर्मगान के चौथे अंतरे का.. 

मांग रहा हूं वचन राम से, मुझको भारत मात मिले 
हर जनम में हिंदुस्तान मिले, हर जनम में हिंदु नाम मिले

 यह लाइनें तो सचमुच ही लेखक और गायक के सामान्य ज्ञान की क्षीणता को प्रदर्शित करती हैं. क्योंकि राम से वचन मांगते वक्त लोगों ने कभी जनम-जनम का फेर नहीं मांगा, बल्कि सदैव उनकी भक्ति का अनुराग ही मांगा. और दूसरी लाइनों में यह कहना कि 'मुझे भारत मात मिले या हिंदुस्तान मिलेÓ तो आपकी जानकारी के लिए बता दिया जाए कि हिंदुस्तान कोई सीमाओं से बंधा हुआ स्थान नहीं है. यह बात अलग है कि आज देशों की सीमाओं ने हर देश का नक्शा अलग खींच दिया है, लेकिन आपके ही हिंदु धर्म के शास्त्रों में लिखा है कि भारत कहां तक फैला हुआ है. भारत कोई जम्मू से कन्या कुमारी और बंगाल से जैसलमेर तक नहीं है, बल्कि पहले आर्यावर्त हुआ करता था, लिहाजा आप दुनिया के किसी भी देश में जन्में आपको हिंदुस्तान मिलेगा. और आज तो लगभग हर देश में एक 'मिनी भारतÓ बसता है. जहां राम-रहीम का नाम संग-संग लिया जाता है. (क्रमश:)

इससे आगे की लाइनों का अर्थ जल्द बताऊंगा...
इसी ब्लॉग पर...


गौरव लहरी

09897935410