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Friday, April 20, 2018

दर्द को सियासत का मोहरा बनाया जा रहा


योगेश मिश्रा
(ब्लॉग गेस्ट राइटर)
कठुआ गैंगरेप कांड ने समाज से लेकर मानवता की उस व्यवहारिक मानसिकता को भी शर्मसार किया है, जो उसे आदमियत होने की पहचान देता है. वाकई कठुआ का केस निंदनीय है, लेकिन इसके उलट एक दूसरी तस्वीर भी सोशल मीडिया के जरिए वायरल की जा रही है, यह तस्वीर हमने अपने ब्लॉग पर सामाजिक भावनाओं को आहत न होने के उद़देश्य से अपलोड नहीं की है, क्योंकि यह तस्वीर वाकई इस केस से भी ज्यादा भयावह और त्रासदी दायक है. जी हां इन दिनों आपके व्हाट्सअप, फेसबुक आदि सोशल मीडिया पर 'त्रिशूल पर कंडोमÓ लगी फोटो को कठुआ गैंगरेप कांड के विरोध में फैलाया जा रहा है. जिसका मकसद साफ है कि कठुआ केस को सांप्रदायिक रंग देकर उससे सियासी लाभ लिया जाए. हो सकता है कि इस तस्वीर से किसी को कुछ देर के लिए सियासी लाभ मिल जाए, लेकिन यह समाज की उस भयानक त्रासदी की ओर जा रही हैं जहां समाज एक भीषण बंटवारे भरे नफरत के मुहाने पर जाकर खड़ा है. जहां छोटी सी चिंगारी धार्मिक विवाद खड़ा करा सकती है. जो सच मानिए, आज के समाज का सच बन गया है. 

कठुआ कांड की जितनी भत्र्सना या निंदा की जाए वो कम है. जाहिर तौर पर आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए. जिससे सामाजिक सीख मिल सके, लेकिन, किसी घटना को धार्मिक टकराव के लिए प्यादा बना देना ये एक नई त्रासदी का संकेत है. समाज में संकेतों का विशेष महत्व होता है लेकिन जब यही संकेत किसी धर्म के अपमान के कारण बनने लगे तो सवाल उठना लाजिमी है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हिंदू देवी देवताओं के अपमान की श्रंखला काफी लंबी है. पर सवाल यही है आखिर कठुआ कांड पर ऐसी तस्वीरों का वायरल करके एक दर्द को सियासत का मोहरा बनाया जा रहा है. जो वाकई भयानक दौर की संकेत दे रहा है. जो सिर्फ टकराव का ही प्रतीक है.

(लेखक के यह अपने स्वतंत्र विचार हैं.

Thursday, March 29, 2018

सब में रब और रब में राम-2




शेष क्रमश:
जाति और पंथ से बढ़कर एक धर्म और जाति होती है, वह है मानवता की. इंसानियत की यह जाति हर मजहब में मायने रखती है. यह बात अलग है कि इसे कुछ लोग अपने रूआब के लिए इस्तेमाल करते हैं. कुछ अपनी दौलत-शौहरत दिखाने के लिए इंसानियत का मजहब अपनाते हैं
तो कुछेक ऐसे भी लोग हैं जाति-मजहब से ऊपर उठकर इंसानियत को ही अपना धर्म मानते हैं, लेकिन हिंदुत्व का जो एजेंडा देश में चल रहा है, वह इस मानव सभ्यता के 'सर्वोच्च धर्म इंसानियतÓ को ही खत्म करने पर आमादा है. खास तौर पर एक बहुचर्चित सियासी दल ने यह एजेंडा देश को 'सीरियाÓ बनाने की राह में पहुंचा दिया है. अपने वोट बैंक के खातिर वह यह समझ नहीं पा रहा है कि यदि इंसानियत खत्म हुई तो दूसरा इसका दुश्मन हैवानियत देश में खड़ी हो जाएगी, फिर वह ना तो धर्म देखेगी, न जाति, न नेता और न जनता. सीरिया की तरह हैवानियत अपना इस कदर असर दिखाएगी कि जनमानस के अस्तित्व पर खतरा मंडरा उठेगा. इसीलिए आज मैं 'सब में रब और रब में राम-2Ó की उन चंद और लाइनों की व्याख्या आपके सामने कर रहा हूं जो कलियुग के वेदव्यास ने हिंदुत्व का माहौल बनाने के लिए अपने मुखारबिंदु से निकाली हैं और उसे एक धर्म की धुरी बनाने का षड्यंत्र रचा है...

डम-डम बाज रहा है, काल के कपाल का
मंदिर वहीं बनाऊंगा चेला हूं महाकाल का

यह कोई नई बात नहीं है कि जब काल के कपाल के डमरू ने शोर मचाया है. उसकी आवाज गूंजी है. वह सीधी सी बात है, जिसका काल आया है, उसे फिर खुद महाकाल भी नहीं बचा सके हैं. फिर चाहे राजा हो या रंक. हरिद्वार वासी हो या उज्जैन में रहने वाला. इसलिए यह कहना कि काल के कपाल का डमरू बाज रहा है और अब मंदिर बनाने का समय आ गया है तो आप यह भली भांति जानते हैं कि देश में यह मुद्दा तकरीबन 150 साल से चल रहा है. आज भी यह मुद्दा देश की सर्वोच्च अदालत में लंबित है. लगभग रोज सुनवाई भी हो रही है, फिर भी अभी कोई फैसला नहीं हो सका है. जबकि 150 वर्ष के एक लंबे समय में देश ने कई बड़े मुद्दों को हल किया है. सियासी इच्छा न होने के कारण यह मुद्दा सिर्फ चुनावी और एक वोट बैंक बनकर रह गया है, नहीं तो यदि सियासी इच्छा प्रबल हो तो यह मुद्दा मिनटों में उसी तरह हल हो सकता है, जिस तरह भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ. बांग्लादेश एक अलग देश बना. अक्साई चीन, पाक अधिकृत काश्मीर यह हिस्सा भी, हमारे देश से अलग हो गए. फिर भला कुछ एकड़ की जमीन का यह मसला हल कैसे नहीं हो सकता. लिहाजा यह कहना कि आप मंदिर बना देंगे, यह बात कहना छोड़ दीजिए, 'व्यास जी.Ó क्योंकि जिसके लिए आप यह धर्मगान गा रहे हैं, सबसे पहले तो वही लोग नहीं चाहते हैं कि मंदिर बने. वरना देश के 20 से अधिक राज्यों और केंद्र में उनकी सरकार होने के बावजूद उन्हें कुछ भी करने से कौन रोक सकता है. लाएं एक कानून संसद में और कह दें कि 2019 के चुनाव से पहले मंदिर बन जाएगा.

अब समझते हैं नीचे लिखी दो लाइनों का अर्थ..

शिखर हिमालय की चोटी पर केसरिया लहराएंगे
लहराएंगे, लहराएंगे, हम केसरिया लहराएंगे

आपने यह तर्कसंगत बात नहीं की है. तथाकथित लेखक ने भी यह सही नहीं लिखा है. सिर्फ और सिर्फ एक वर्ग विशेष की भावनाओं को भड़काने की कोशिश भर है. जो देश में धार्मिक जंग उत्पन्न करने के हालात खड़े कर सकता है. वरना वास्तविकता और हकीकत ये है कि शिखर हिमालय पर पहुंचना हर किसी के वश की बात नहीं है, जो हिमालय पर पहुंच जाते हैं वह अपने राष्ट्र का ध्वज पताका फहराते हैं, न कि किसी वर्ग, जाति और धर्म का. तार्किक स्तर पर तो यह लाइनें निरर्थक और व्यर्थ तौर पर ही लिखी गई हैं. इन्हें कोई न तो समझे और ना ही गंभीरता से ले. (क्रमश:)
अभी कुछ लाइनें और शेष हैं...

जल्द ही उनकी भी व्याख्या करूंगा,

देखते रहिए बस यह ब्लॉग...


Monday, March 19, 2018

सब में रब और रब में राम - 1



एक थे 'वेद व्यास जीÓ. महाभारत काल का उन्होंने वर्णन किया था. धर्म ग्रंथों और स्कूली किताबों में भी इस तथ्य की पुष्टि होती है. और आज कलयुग है. त्रेता के राम को एक नए 'वेद व्यास जीÓ ने नए सिरे से गढ़ दिया है. अपने ओजपूर्ण और जज्बाती तेवरों के साथ उन्होंने जो यह गगनभेदी धर्मगान गाया है, वह आखिर क्या है? समझ नहीं आता, वह कहते हैं कि ...

मैं हिंदू जगाने आया हूं, मैं हिंदू जगाकर जाऊंगा 
मरते दम तक अपने मुख से जय श्री राम गाऊंगा 

..तो क्या आज तक हिंदू जागा हुआ नहीं था. क्या अब तक हिंदू कुम्भकर्णी नींद सोया हुआ था. क्या आपके जगाने से ही हिंदू की रगों में खून दौड़ेगा और उनके मुख से 'जयश्रीरामÓ सरीखा नारा निकलेगा.
शायद नहीं. बल्कि बिलकुल नहीं, और मेरी नजर से तो कतई नहीं.
वजह है, वो भी बड़ी. हिंदू कोई कुम्भकर्ण नामक व्यक्ति नहीं है. जो छह महीने सोता है और छह महीने अपने जीवन यापन के लिए जरूरी संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल करता है. बल्कि हिंदू एक विचारधारा है. एक सभ्यता है. जो आत्म शंाति की तरफ ले जाने के लिए अध्यात्म का रास्ता चुनती है और आत्मा का परमात्मा में मिलन कराती है.

अब जिक्र इसी धर्मगान के दूसरे अंतरे का... 

दमक रहीं तलवारें सबकी, चमक रहा त्रिशूल है
हिन्दू को कमजोर न समझे, ये दुश्मन की भूल हैं

...जरा मुझे बताइए कि क्या हिंदुओं ने पहले कभी तलवारें नहीं उठाई हैं. जो अब तलवारें लहराने और उनको चमकाने की बात कही जा रही है. बल्कि जब-जब धर्म की हानि हुई है, हिंदू ही जागा है और उसने आगे बढ़कर धर्म की रक्षा की है. क्या आपके बताने से त्रिशूल और तलवारें चमकेंगी. त्रेता में भगवान श्रीराम धनुष और द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र नहीं उठाया था. कलियुग में क्यों हिंदुओं के बलिदानों को भूल जाते हो. मंगल पांडे, भगत सिंह और चंद्रशेखर, आखिर हिंदू ही तो थे. लिहाजा दुश्मन यह भली भांति जानता है कि यह समाज अपने आप में परिपूर्ण सामथ्र्य और वतनपरस्ती रखता है.

अब जिक्र इसी धर्मगान के तीसरे अंतरे का 

सब में रब और रब में राम
मिलकर बोलो जय श्री राम

 यह लाइन गाते वक्त शायद 'व्यास जीÓ भूल गए कि वह खुद ही हिंदु-मुस्लिम के एकजुट होने की बात अप्रत्यक्ष तौर पर कर गए. क्योंकि उन्होंने खुद कहा कि सब में रब, यानी हर एक व्यक्ति में रब समाया हुआ है, फिर क्या हिंदु और क्या मुस्लिम. सिर्फ 'व्यास जीÓ ने ही रब में भेद कर दिया. रब में राम कहकर. उन्होंने रब को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया. जबकि छोटी क्लासों के बच्च्े भी जानते हैं कि जब वह राम और रमजान लिखेंगे तो दोनों के शुरूआती शब्द 'रामÓ ही लिखे जाएंगे. लिहाजा मिलकर 'जयश्रीरामÓ बोला जाए तो मिलकर 'अल्लाह हो अकबरÓ बोलना भी इस देश की तहजीब में आता है.

अब जिक्र इसी धर्मगान के चौथे अंतरे का.. 

मांग रहा हूं वचन राम से, मुझको भारत मात मिले 
हर जनम में हिंदुस्तान मिले, हर जनम में हिंदु नाम मिले

 यह लाइनें तो सचमुच ही लेखक और गायक के सामान्य ज्ञान की क्षीणता को प्रदर्शित करती हैं. क्योंकि राम से वचन मांगते वक्त लोगों ने कभी जनम-जनम का फेर नहीं मांगा, बल्कि सदैव उनकी भक्ति का अनुराग ही मांगा. और दूसरी लाइनों में यह कहना कि 'मुझे भारत मात मिले या हिंदुस्तान मिलेÓ तो आपकी जानकारी के लिए बता दिया जाए कि हिंदुस्तान कोई सीमाओं से बंधा हुआ स्थान नहीं है. यह बात अलग है कि आज देशों की सीमाओं ने हर देश का नक्शा अलग खींच दिया है, लेकिन आपके ही हिंदु धर्म के शास्त्रों में लिखा है कि भारत कहां तक फैला हुआ है. भारत कोई जम्मू से कन्या कुमारी और बंगाल से जैसलमेर तक नहीं है, बल्कि पहले आर्यावर्त हुआ करता था, लिहाजा आप दुनिया के किसी भी देश में जन्में आपको हिंदुस्तान मिलेगा. और आज तो लगभग हर देश में एक 'मिनी भारतÓ बसता है. जहां राम-रहीम का नाम संग-संग लिया जाता है. (क्रमश:)

इससे आगे की लाइनों का अर्थ जल्द बताऊंगा...
इसी ब्लॉग पर...


गौरव लहरी

09897935410