Thursday, March 29, 2018

सब में रब और रब में राम-2




शेष क्रमश:
जाति और पंथ से बढ़कर एक धर्म और जाति होती है, वह है मानवता की. इंसानियत की यह जाति हर मजहब में मायने रखती है. यह बात अलग है कि इसे कुछ लोग अपने रूआब के लिए इस्तेमाल करते हैं. कुछ अपनी दौलत-शौहरत दिखाने के लिए इंसानियत का मजहब अपनाते हैं
तो कुछेक ऐसे भी लोग हैं जाति-मजहब से ऊपर उठकर इंसानियत को ही अपना धर्म मानते हैं, लेकिन हिंदुत्व का जो एजेंडा देश में चल रहा है, वह इस मानव सभ्यता के 'सर्वोच्च धर्म इंसानियतÓ को ही खत्म करने पर आमादा है. खास तौर पर एक बहुचर्चित सियासी दल ने यह एजेंडा देश को 'सीरियाÓ बनाने की राह में पहुंचा दिया है. अपने वोट बैंक के खातिर वह यह समझ नहीं पा रहा है कि यदि इंसानियत खत्म हुई तो दूसरा इसका दुश्मन हैवानियत देश में खड़ी हो जाएगी, फिर वह ना तो धर्म देखेगी, न जाति, न नेता और न जनता. सीरिया की तरह हैवानियत अपना इस कदर असर दिखाएगी कि जनमानस के अस्तित्व पर खतरा मंडरा उठेगा. इसीलिए आज मैं 'सब में रब और रब में राम-2Ó की उन चंद और लाइनों की व्याख्या आपके सामने कर रहा हूं जो कलियुग के वेदव्यास ने हिंदुत्व का माहौल बनाने के लिए अपने मुखारबिंदु से निकाली हैं और उसे एक धर्म की धुरी बनाने का षड्यंत्र रचा है...

डम-डम बाज रहा है, काल के कपाल का
मंदिर वहीं बनाऊंगा चेला हूं महाकाल का

यह कोई नई बात नहीं है कि जब काल के कपाल के डमरू ने शोर मचाया है. उसकी आवाज गूंजी है. वह सीधी सी बात है, जिसका काल आया है, उसे फिर खुद महाकाल भी नहीं बचा सके हैं. फिर चाहे राजा हो या रंक. हरिद्वार वासी हो या उज्जैन में रहने वाला. इसलिए यह कहना कि काल के कपाल का डमरू बाज रहा है और अब मंदिर बनाने का समय आ गया है तो आप यह भली भांति जानते हैं कि देश में यह मुद्दा तकरीबन 150 साल से चल रहा है. आज भी यह मुद्दा देश की सर्वोच्च अदालत में लंबित है. लगभग रोज सुनवाई भी हो रही है, फिर भी अभी कोई फैसला नहीं हो सका है. जबकि 150 वर्ष के एक लंबे समय में देश ने कई बड़े मुद्दों को हल किया है. सियासी इच्छा न होने के कारण यह मुद्दा सिर्फ चुनावी और एक वोट बैंक बनकर रह गया है, नहीं तो यदि सियासी इच्छा प्रबल हो तो यह मुद्दा मिनटों में उसी तरह हल हो सकता है, जिस तरह भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ. बांग्लादेश एक अलग देश बना. अक्साई चीन, पाक अधिकृत काश्मीर यह हिस्सा भी, हमारे देश से अलग हो गए. फिर भला कुछ एकड़ की जमीन का यह मसला हल कैसे नहीं हो सकता. लिहाजा यह कहना कि आप मंदिर बना देंगे, यह बात कहना छोड़ दीजिए, 'व्यास जी.Ó क्योंकि जिसके लिए आप यह धर्मगान गा रहे हैं, सबसे पहले तो वही लोग नहीं चाहते हैं कि मंदिर बने. वरना देश के 20 से अधिक राज्यों और केंद्र में उनकी सरकार होने के बावजूद उन्हें कुछ भी करने से कौन रोक सकता है. लाएं एक कानून संसद में और कह दें कि 2019 के चुनाव से पहले मंदिर बन जाएगा.

अब समझते हैं नीचे लिखी दो लाइनों का अर्थ..

शिखर हिमालय की चोटी पर केसरिया लहराएंगे
लहराएंगे, लहराएंगे, हम केसरिया लहराएंगे

आपने यह तर्कसंगत बात नहीं की है. तथाकथित लेखक ने भी यह सही नहीं लिखा है. सिर्फ और सिर्फ एक वर्ग विशेष की भावनाओं को भड़काने की कोशिश भर है. जो देश में धार्मिक जंग उत्पन्न करने के हालात खड़े कर सकता है. वरना वास्तविकता और हकीकत ये है कि शिखर हिमालय पर पहुंचना हर किसी के वश की बात नहीं है, जो हिमालय पर पहुंच जाते हैं वह अपने राष्ट्र का ध्वज पताका फहराते हैं, न कि किसी वर्ग, जाति और धर्म का. तार्किक स्तर पर तो यह लाइनें निरर्थक और व्यर्थ तौर पर ही लिखी गई हैं. इन्हें कोई न तो समझे और ना ही गंभीरता से ले. (क्रमश:)
अभी कुछ लाइनें और शेष हैं...

जल्द ही उनकी भी व्याख्या करूंगा,

देखते रहिए बस यह ब्लॉग...


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