काम का बोझ और मौसम की तपिश ने झिझोड़ कर रख दिया है। शांति की तलाश चाहिए। अध्यात्म भी जरूरी है। सो चल पड़ा हूँ मैं। आगरा से माउंट आबू की तरफ। स्टेशन पर पहुंचकर लगा कि कमजोर काया कैसे चल पाएगी, लेकिन लगभग एक साल के बाद आज फिर से देशाटन के उत्साह ने लबरेज कर दिया है। 3 मंजिला सीढ़ी चढ़ना मुमकिन नहीं था मेरे लिए, फिर भी अपने साथी मिस्टर जॉनी (अमर उजाला में कार्यरत) के उत्साहवर्धन और सहयोग ने मुझमें ऊर्जा का संचार भर दिया। प्लेटफार्म पर पहुंच गया तो ट्रेन भी खड़ी मिली। अपनी सीट तलाशी और बैठ गया पालती मारकर। फिर वही यात्रा का आनंद लेते हुए चला। कोच में रौनक बनी हुई है। 5 साल की बच्ची अपनी माँ के पास पापा से गर्मी लगने की कह रही है। रेलवे पुलिस फोर्स गश्ती पर है। मिडिल बर्थ खुलने लगी है। ट्रेन रफ़्तार पकड़ चुकी है। धीरे-धीरे लोग सीट पर जमकर नींद के आग़ोश में जा रहे हैं। चारों तरफ अंधेरा औऱ दूर चमकती हुई लाइट्स मेरे शहर के पीछे छूटने के संकेत दे रहीं हैं। मेरी आंखों में नींद ने दस्तक देने की शुरुआत कर दी है। शहर पीछे छूट गया। और मैं भी अब सोने के मूड में हूँ। सो अब सोते हैं। कल 10 बजे अपनी मंजिल पर पहुंचने पर फिर आपसे बात करेंगे।
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