अधिकार दीजिए, छीनिए नहीं
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन क्या इसकी कोई लकीर खींचनी चाहिए। रचनात्मक, कलात्मक आलोचना और अपमान के बीच कोई सीमा खड़ी की जानी चाहिए। धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने को लेकर भारत में समय-समय पर विवाद होता रहा है। कई पुस्तकें प्रतिबंधित हुई हैं। उपन्यासों को जलाया गया तो समाचार पत्रों तक की होली जलाई गई। शार्ली एब्दो पर हमले की बरसी के चंद रोज बाद ही कीकू शारदा की पुलिस हिरासत के बाद ये सवाल और भी मौजू हो चला है। और ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन केवल भारत में ही अपना विस्तार कर रहा बल्कि फ्रांस और ब्रिटेन जैसे विकसित देषों में भी अपने पांव पसार रही है। मुसलमानों के संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत तक ने शार्ली अब्दो सरीखे कांड की निंदा की। मजलिसे-मुशावरत के एक बयान में कहा गया था कि सभी सभ्य समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन यह स्वतंत्रता रचनात्मक आलोचना तक सीमित होनी चाहिए और विभिन्न धार्मिक पुस्तकों और पैगम्बरों आदि के अपमान के लिए उपयोग नहीं की जानी चाहिए। भारत में पेरिस जैसे मामले का सामना पहली बार 1920 के दशक में उस समय हुआ जब अविभाजित भारत के शहर लाहौर में एक आर्य समाजी हिंदू प्रकाशक ने मुसलमानों के पैगंबर हजरत मोहम्मद के निजी जीवन के बारे में एक विवादास्पद किताब प्रकाषित की। पैगम्बर मोहम्मद पर लिखी जाने वाली किताब के प्रकाशक राजपाल को पकड़ लिया गया और उनके खिलाफ मुकदमा चला। तब धर्म के अपमान का कोई रूप नहीं था। हालांकि कई साल बाद उन्हें रिहा कर दिया गया, लेकिन एक मुस्लिम युवक ने इसी रंजिशन राजपाल की हत्या कर दी। हत्यारे को फांसी हुई। इस घटना के बाद नतीजा ये निकला भारतीय दंड संहिता में धर्म के अपमान की धारा 295-ए के तौर पर शामिल किया गया। भारत में 1988 में ब्रिटेन के प्रसिद्ध लेखक सलमान रश्दी की किताब सैटेनिक वर्सेज पर मुसलमानों के विरोध और धमकियांे के कारण प्रतिबंध लगाया गया। आज से तीन साल पूर्व सलमान रश्दी मुसलमानों के धार्मिक संगठनों की धमकी के कारण देष के जयपुर में आयोजित लिटरेचर फेस्टीवल में षामिल नहीं हो सके थे। इसके अलावा तमाम पुस्तकें सिर्फ इसी वजह से अभी तक प्रतिबंध झेल रही हैं, क्योंकि उनमें धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली सामिग्री परोसी जानी है। बंगलादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन भी देष में मुस्लिमजनों में नफरती नजर से देखी जाती हैं। जबकि नसरीन खुद मुसलमान हैं। इसी तरह मकबूल फिदा हुसैन को हिंदूवादी नेताओं और कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर करना पड़ा। मकबूल फिदा तो कट्टरपंथियों के हमले से इतने आशंकित रहे कि उन्हें अपनी आखिरी सांस विदेष में ही लेनी पड़ी। लेखकों के बाद बात करें कलाकारों की तो राजू श्रीवास्तव, कपिल शर्मा और भारती सिंह सरीखे काॅमेडियन पर कानून बनाने वाले उस वक्त ठहाका लगाने से नहीं चूकते जब वह खुद उनकी मिमिक्री करते हैं। युवा दिलों की धड़कन कहे जाने वाले कवि डाॅ0 कुमार विश्वास ने भी मंच से कई बार राजनेता और धार्मिक व्यक्तित्वों के खिलाफ जहर उगला है। तब तो कोई हल्ला नहीं मचा, लेकिन सिर्फ कीकू शारदा द्वारा एक डेरा प्रमुख की नकल करने की बात ने इतना बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया। पुलिस ने भी इतनी तत्परता दिखाई कि कीकू शारदा सरीखे कलाकार को उठाकर सींखचों के पीछे धकेल दिया। बाद में नाटकीय घटनाक्रम के तहत उसे छोड़ दिया। डेरा प्रमुख ने भी कीकू के माफी मांग लेने की बात पर विवाद समाप्त करने का बयान देकर पल्ला झाड़ लिया। दरअसल, ये एपिसोड पूरी तरह स्क्रिप्टेड दिखता है। अपने संगठन को सुर्खियों में लाने और अपने आप को शक्तिशाली दर्शाने के तथ्य को स्पष्ट करने की गोपनीय रणनीति नजर आती है। लिहाजा जरूरत छिपी शक्तियों पर शिकंजा कसने की जरूरत है न कि कलाकारों पर अपना रौब जमाने की। वजह साफ है, भारत का संविधान एक धर्मनिरपेक्ष, सहिष्णु और उदार समाज का उदाहरण है। संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। और कोई भी राज्य और धर्म इस अधिकार को छीन नहीं सकता।
Thursday, January 14, 2016
अधिकार दीजिए, छीनिए नहीं
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