Tuesday, January 19, 2016

उपाधि वापिसी से समाधान खोजें


अभी कुछ रोज पहले बेहतर सहिष्णुता भेद का शिकार बने बाॅलीवुड के महान कलाकार आमिर खान अभिनीत फिल्म तारे जमीन पर दुबारा देखी। उसमें एक सीन बहुत खूबसूरत लगा। जब इशान अवस्थी के पिता आमिर खान से मिलने क्लास में पहुंचे और आमिर खान ने उन्हें एक ऐसे देश में विचित्र परंपरा के बारे में बताया, जिसमें पौधे को खत्म करने के लिए उसे सिर्फ कोसा जाता है। सीन के अंदर की गहराई पर अब बात करते हैं। आमिर खान अप्रत्यक्ष रूप से समस्या की असल वजह को खत्म करके समाधान ढूंढने की बात करते हैं। बस, यहीं से हमारा ये लेख शुरू होता है।
आज देश में समस्याओं को अमरबेल की तरह बढ़ाना राजनीतिक दलों को तो बखूबी आता है। राजनीति के लोग और उनके समर्थक किसी भी छोटे से मुद्दे को बड़ा बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं। ये कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे अवसर भी तलाशते रहते हैं। फिर चाहे दादरी में तथाकथित अखलाक का बीफ खाना हो, या मालदा का केस। अथवा अभी हाल में सुर्खियां बन रहा हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला के आत्मदाह का मामला हो। इस केस पर मंगलवार को तो एक और नई बात सामने आई। वह ये कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जहां केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय का इस्तीफा मांगा, वहीं हैदराबाद विश्वविद्यालय से ही डी. लिट की उपाधि पाने वाले प्रख्यात लेखक अशोक वाजपेयी ने अपनी उपाधि लौटाने की बात कहकर केस से कहीं ज्यादा सुर्खियां बटोर लीं। मामले पर गुस्सा जायज है। राजनीतिक प्रधान देश में राजनीति भी होना लाजिमी है, लेकिन लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार मिलने के बावजूद अपनी उपाधि और पुरस्कार लौटाने का कदम कुछ ज्यादा ही हास्यास्पद और निराशावादी नजर आता है। मैं मानता हूं कि यदि आप विरोध दर्ज कराना चाहते हैं, तो उसके और भी कई तरीके हैं। उन तरीकों को अपनाकर अपनी बात रखें। लेकिन एक बात और भी है कि यदि आप बुद्धिजीवी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं तो अपने आप को नियंत्रित रखें। विरोध के लिए अपनी लेखनी, अपने शब्दों को आवाज बनाएं। ये हालात और समस्याएं क्यों उत्पन्न हुईं, उन पर मंथन करें। पुरस्कार या उपाधि को वापिस करने से विरोध दर्ज कराना समझ से परे है। इस निर्णय से तो अन्य लेखक और उपाधिधारियों को विरोध करने का एक नया तरीका मिलेगा। एक नई परंपरा फिर गढ़ी जाएगी, इस पर लोग चल उठेंगे। माना कि बिगड़ी सत्ता और सिस्टम के चलते समस्या का समाधान संभव नहीं है, लेकिन ऐसे हालात भी नहीं हैं, जिनका कोई हल नहीं है। इसके लिए मंथन जरूरी है। एकजुटता जरूरी है। सुझाव और सलाह रखना जरूरी है। एक कदम तो ये कि युवाओं को निराशा की तरफ खिंचे चले जाने की वजहों को जड़ से खत्म करना जरूरी है। इसके लिए जरूरी है कि उन्हें बेरोजगारी, अशिक्षा के दलदल से बाहर लाया जाए। दूसरा बुद्धिजीवियों का जो ज्ञान है, वह युवा पीढ़ी को संसाधनों के साथ शेयर करें। ताकि उन्हें अनुभवहीनता और अज्ञानता का आभास न हो। और वह अपने आप को कमजोर महसूस न करें।

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