Saturday, April 28, 2018

खुशियों की खुदकुशी का नगर कुशीनगर

शीर्षक पढऩे के बाद आपका जेहन सीधे कुशीनगर के उस ट्रेन हादसे की तरफ मुड़ जाएगा, जिसमें 13 मासूमों की मौत हो गई. वीभत्स नजारा था. लापरवाही थी. संवेदनहीनता भी कही जाएगी. ड्राइवर से लेकर प्रशासन तक की. अब चौराहे पर उतरे हैं. सड़कों पर शोर है. सख्ती है. होनी भी चाहिए. लेकिन मामला आज ट्रेन हादसे का नहीं. जिक्र किसी और बात का है. उक्त हादसा तो एक ड्राइवर की लापरवाही से हुआ, लेकिन दूसरा जो हादसा हम बताने जा रहे हैं, वह संवेदनहीन की पराकाष्ठा का और पार करता हुआ नजर आता है. जानकर भी बाप अपने बेटे की गलती को दरकिनार कर देता है, लेकिन आज का निष्ठुर जमाना बेटे को शायद यह इजाजत नहीं देता है. बेटा जानता है कि यह मेरा पिता है. शरीर से सिर्फ हाड़ है. दिमाग सोचने का सामथ्र्य खो चुका है, और अर्थ. अर्थ की तो इसके बाद बात ही नहीं की जा सकती है, लिहाजा जिस बेटे की शक्ल देखकर वह सांसे लिया करता था, वही बेटा आज अपने बाप की शक्ल सिर्फ घर में देखकर आगबबूला हो उठा. आगे क्या हुआ, इसके लिए हमारे गेस्ट राइटर योगेश मिश्रा जी की मेरठ से कुशीनगर की स्पेशल न्यूज पर फोकस करिए...



पिता गिड़गिड़ाता रहा, बेटे पीटते रहे 
उसका पिता उससे रहम की भीख मांग रहा था, लेकिन बेटा बेदर्द होकर अपने ही बाप पर डंडे बरसा रहा था, वो पिता जिसने जिंदगी के हर मोड़ अपने बेटे की खुशियों के लिए सबकुछ न्यौछावर कर दिया था. जी हां आज के समाज की यह तस्वीर है जिसे हम और आप सभ्य समाज के रूप में परिभाषित करते हैं. संसाधनों के इस युग में संवेदनाएं कितनी सिमट गई है. यूपी के कुशीनगर जिले की ये तस्वीरें सवाल उठा रही हैं. वाकई क्या आज के समाज का ताना-बाना इतना कमजोर हो गया है, कि एक बेटा अपने पिता पर डंडे बरसाने से भी नहीं चूकता है. आइए जरा इस कहानी को समझते है.ं

पिता को ही घर से निकाला 
बताते हैं कुशीनगर जिले के नौका टोला इलाके में नुरूल इस्लाम उर्फ हत्थू के दो बेटे हैं. जब उनके शरीर में ताकत रही तो उन्होंने अपने बेटों को कोई कमी नहीं होने दी. लेकिन उम्र के अंतिम पड़ाव में दोनों बेटों ने ही उनको घर से निकाल दिया. चार साल पहले उन्हें दोनों बेटों-मोनू व रहीम ने घर से भगा दिया था. हालांकि हत्थू की दिमागी हालत ठीक नहीं है, बीते दिनों जब हत्थू अपने घर आया तो उनके बेटों ने उसे रस्सी से बांधकर सड़क पर डंडों से पिटाई कर दी. हालांकि इस दौरान आसपास के लोग बचाने भी आए, लेकिन बेरहम बेटा अपने बाप को पीटता रहा.

Wednesday, April 25, 2018

गठबंधन तो ठीक पर सीट बंटवारे पर मुश्किल


सियासत में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती हैं: कहावत 

मुद्दों के आसरे कभी एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लडऩे वाली पार्टियां अब एक मंच के नीचे ही मोदी लहर के खिलाफ एकजुट होने की कवायद करने में जुटी है. यानि 2019 में महागठबंधन के आसरे ही क्षत्रप राजनीति को ऑक्सीजन मिलेगी. और अगर मोदी लहर को हराने में कामयाब रही तो यही गठबंधन दिल्ली की गद्दी पर भी अपना दावा ठोंक सकेगा.
अखिलेश और मायावती के साथ आने से एक ओर जहां यूपी की सियासी तस्वीर बदलने लगी है तो वहीं दूसरी ओर देश में मोदी को रोकने के लिए एक सियासी मुहिम शुरू हो चुकी है. हालांकि, 2014 के आम चुनाव में जिस प्रकार से मोदी ने तमाम क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया था. अब वहीं क्षेत्रीय दल महागठबंधन के आसरे ही अपनी जमीन तलाश रहे हैं. मायावती, अखिलेश ने 2019 के लिए गठबंधन का ऐलान किया है.
कांग्रेस यदि गठबंधन का हिस्सा नहीं बनी, तो भी एसपी-बीएसपी उसके लिए दो सीटें छोड़ेंगी. लोकसभा चुनाव 2019 के लिए सीट बंटवारे की कसरत में जुटी दोनों पार्टियों ने तय किया है कि रायबरेली और अमेठी सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारेंगी. फिलहाल एसपी-बीएसपी 78 सीटों पर चुनाव लडऩे की तैयारी के साथ सीट बंटवारे को अंतिम रूप दे रही हैं.
हालांकि, अब सबसे ज्यादा नजर यही रहेगी कि यूपी में सपा और बसपा के बीच सीटों को लेकर तालमेल कैसे बनता है. दरअसल, मायावती और अखिलेश के सियासी वजूद के बीच कांग्रेस भी अगर गठबंधन में शामिल होती है तो स्थितियां कुछ भी पेचीदा हो सकती हैं.
ऐसी स्थिति में बीएसपी का पलड़ा भारी है. मायावती लगातार यह भी इशारा करती रही हैं कि वह गठबंधन करेंगी तो उन्हें सम्मानजक सीटें चाहिए. वहीं अखिलेश भी राज्यसभा में बीएसपी की हार के बाद कह चुके हैं कि समाजवादी बड़े दिल वाले हैं.


  
 योगेश मिश्रा
(गेस्ट राइटर)

Friday, April 20, 2018

दर्द को सियासत का मोहरा बनाया जा रहा


योगेश मिश्रा
(ब्लॉग गेस्ट राइटर)
कठुआ गैंगरेप कांड ने समाज से लेकर मानवता की उस व्यवहारिक मानसिकता को भी शर्मसार किया है, जो उसे आदमियत होने की पहचान देता है. वाकई कठुआ का केस निंदनीय है, लेकिन इसके उलट एक दूसरी तस्वीर भी सोशल मीडिया के जरिए वायरल की जा रही है, यह तस्वीर हमने अपने ब्लॉग पर सामाजिक भावनाओं को आहत न होने के उद़देश्य से अपलोड नहीं की है, क्योंकि यह तस्वीर वाकई इस केस से भी ज्यादा भयावह और त्रासदी दायक है. जी हां इन दिनों आपके व्हाट्सअप, फेसबुक आदि सोशल मीडिया पर 'त्रिशूल पर कंडोमÓ लगी फोटो को कठुआ गैंगरेप कांड के विरोध में फैलाया जा रहा है. जिसका मकसद साफ है कि कठुआ केस को सांप्रदायिक रंग देकर उससे सियासी लाभ लिया जाए. हो सकता है कि इस तस्वीर से किसी को कुछ देर के लिए सियासी लाभ मिल जाए, लेकिन यह समाज की उस भयानक त्रासदी की ओर जा रही हैं जहां समाज एक भीषण बंटवारे भरे नफरत के मुहाने पर जाकर खड़ा है. जहां छोटी सी चिंगारी धार्मिक विवाद खड़ा करा सकती है. जो सच मानिए, आज के समाज का सच बन गया है. 

कठुआ कांड की जितनी भत्र्सना या निंदा की जाए वो कम है. जाहिर तौर पर आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए. जिससे सामाजिक सीख मिल सके, लेकिन, किसी घटना को धार्मिक टकराव के लिए प्यादा बना देना ये एक नई त्रासदी का संकेत है. समाज में संकेतों का विशेष महत्व होता है लेकिन जब यही संकेत किसी धर्म के अपमान के कारण बनने लगे तो सवाल उठना लाजिमी है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हिंदू देवी देवताओं के अपमान की श्रंखला काफी लंबी है. पर सवाल यही है आखिर कठुआ कांड पर ऐसी तस्वीरों का वायरल करके एक दर्द को सियासत का मोहरा बनाया जा रहा है. जो वाकई भयानक दौर की संकेत दे रहा है. जो सिर्फ टकराव का ही प्रतीक है.

(लेखक के यह अपने स्वतंत्र विचार हैं.

Thursday, April 19, 2018

नेचुरल या इंटेंशनली कैश क्राइसिस


इस समय पर्याप्त करेंसी चलन में है. कुछ राज्यों में अचानक 
बढ़ी असामान्य मांग के कारण करेंसी नोटों की कमी हुई है. 
यह अस्थायी है. इससे तेजी से निपटा जा रहा है. 
अरूण जेटली
वित्त मंत्री, 
भारत सरकार

Courtsy by: Jagran.com

देश एक बार फिर संकट के दौर से गुजर रहा है. जी हां यह संकट नकदी का है. 'नोटबंदीÓ के डेढ़ साल बाद 'नकदबंदीÓ से एटीएम खाली पड़े हुए हैं. लोगों को पैसा निकालना हैं तो वो फिर से कतार में खड़े हो रहे हैं. यूपी, पंजाब, गुजरात, पूर्वी महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कई इलाकों के एटीएम में करेंसी नोटों की किल्लत खड़ी हो गई है. इन राज्यों में एटीएम या तो खाली पड़े हुए हैं बंद पड़े हुए हैं. इससे लोग परेशान हैं. यह बात अलग है कि मंगलवार को वित्त मंत्रालय ने नकदी की कमी, एटीएम में नकदी न होने और कुछ के चालू न होने की बात स्वीकार की, लेकिन यह भी कहा कि तीन माह में बढ़ी करेंसी की असाधारण डिमांड ने यह समस्या उत्पन्न कर दी है. वित्त मंत्री बेशक बीमार हैं, लेकिन ट्विट के जरिए वह कहते हैं कि इस समय पर्याप्त करेंसी चलन में है. कुछ राज्यों में अचानक बढ़ी असामान्य मांग के कारण करेंसी नोटों की कमी हुई है. यह अस्थायी है. इससे तेजी से निपटा जा रहा है. वहीं वित्त मंत्रालय ने यह भी कहा है कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और बिहार के कुछ इलाकों में अचानक बढ़ी मांग को पूरा करने के लिए अप्रैल में 13 दिन के अंदर 45 हजार करोड़ की नकदी आपूर्ति बढ़ाई गई है. सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक के साथ ही अन्य बैंकों से मांग के अनुरूप करेंसी की उपलब्धता सुनिश्चित कराने को कहा है.
वित्त मंत्रालय के यह तमाम दावे सुनने में तो राहत दे सकते हैं, लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट कुछ और ही हाल बतलाती है. कैश की वाकई किल्लत आन खड़ी हुई है.

  • कोई अपनी बीमार मां के इलाज के लिए पैसा चाहता है. लेकिन कैश नहीं है. 
  • कोई अपने बच्चों के स्कूल की फीस जमा करना चाहता है, लेकिन कैश नहीं है. 
  • किसी मां-बाप के घर से बिटिया ब्याही जानी है, लेकिन कैश नहीं है.

यह कैश क्यों नहीं है, इसके लिए हमें रिजर्व बैंक के ही कुछ आंकड़ों को समझना होगा.
7 नवंबर 2016 से पहले 17.97 लाख करोड़ की मुद्रा चलन में थी. (भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार)
6 अप्रैल 2018 को 18.17 लाख करोड़ का कैश बाजार में मौजूद था.
फिर भला छह दिन में ऐसा क्या हुआ कि कैश बाजार से गायब हो गया. एटीएम सूखने लगे. 'नो कैशÓ के बोर्ड टांग दिए गए. आखिर जब 18 लाख करोड़ रूपया मार्केट में था, वह अचानक गायब कैसे हो गया. इसके पीछे तर्क दिया जा सकता है कि

  1. फसल कटने के बाद किसानों के भुगतान में रूपयों का इस्तेमाल अधिक हो रहा है. 
  2. वेडिंग सीजन के चलते लोग ज्यादा रूपया अपनी जेब में दबाकर रखना चाहते हैं.
  3. एजुकेशन सेशन की स्टार्टिंग भी इन्ही दिनों होने से स्कूलों में ज्यादा पैसा जा रहा है. 
  4. वित्तीय वर्ष समाप्ति के चलते भी नौकरी पेशा और बिजनेसमैन को रूपये की जरूरत रहती है. 

लेकिन, उपरोक्त कारणों को सुनने और देखने के बाद कैश की किल्लत की वजह को वाजिब नहीं माना जा सकता है. बड़ा सवाल तो ये है कि चारों कारण तो हर साल होते हैं, फिर ऐसा इस वर्ष या अपै्रल के सात दिनों में क्या हो गया जो बड़े पैमाने पर आधे से ज्यादा भारत में कैश का संकट गहरा गया है?
दरअसल, मेरा मानना है कि देश में कैश की यह किल्लत भी सियासती हो चली है. देश के तीन बड़े राज्यों में 2018 के अंत या फिर 2019 के शुरूआत में विधानसभा चुनाव और देश के आम चुनाव भी होने हैं. कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान. तीनों ही इलेक्शन में वोटों का खेल बिना नोटों के खेला नहीं जा सकता है. जहां दो राज्यों में बीजेपी फिर से अपनी ही सत्ता को दोहराने के लिए जी-जान लगाने को आतुर है, वहीं कर्नाटक में कांग्रेस से सत्ता छीनने का मन बना चुकी है. चुनावों में व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार, जनसभाएं और बड़े नेताओं की रैली करना, बिना कैश के संभव नहीं है. ऐसे में सत्ताधारी पार्टियों ने अभी से अपने दल की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए रूपया दबाना शुरू कर दिया है. ऐसा मैं सिर्फ एक अपने अनुमान के अनुसार कह रहा हूं. यह किसी भी दस्तावेजी रिपोर्ट में अंकित नहीं है.
दूसरा बड़ा कारण खुद बैंकों द्वारा पैदा किया गया है. आरबीआई की रिपोर्ट पर गौर फरमाएं तो कई बैंकों ने लोन देने के बाद वसूली करना, शायद अपनी शान के खिलाफ समझ लिया है. क्योंकि आरबीआई के आंकड़े गवाह हैं कि 2014 से दिसंबर 2017 तक बैंकों ने जो कर्ज दिया उसके सापेक्ष वसूली बमुश्किल छह से दस फीसद तक ही की है. एसबीआई ने 102587 लाख करोड़ का कर्ज दिया, लेकिन वसूला सिर्फ 10396 करोड़ रूपया. पीएनबी ने 27814 करोड़ रूपये का कर्ज दिया, लेकिन वसूली की 6270 करोड़ की. बैंक ऑफ इंडिया ने 1099 करोड़ रूपये की वसूली की, लेकिन लोन बांटा 17680 करोड़ रूपये का. इस दिशा में यूको बैंक ने तो लोन का तमाशा ही बनाकर रख दिया. तीन साल के अंदर 6087 करोड़ रूपया बांटा लेकिन वसूली एक फूटी कौड़ी नहीं की. इसके अलावा आईडीबीआई, केनरा बैंक, कॉरपोरेशन बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और इंडियन ओवरसीज बैंक भी, इस फेहरिस्त में शामिल हैं.


तीसरा और आखिरी कारण. पिछले साल मई में 2000 के नए नोटों को छापना रिजर्व बैंक ने बंद कर दिया है. लिहाजा जो नोट छापे गए थे उनमें से केवल अब मार्केट में एक डाटा के अनुसार 30 फीसद ही चलन में है. यानी सर्कुलेट हो रहे हैं, बाकी 70 फीसद 2000 के नोट कहां गए, कोई नहीं जानता.
अब आपकी खुद समझ में आ गया होगा कि आखिर कैश की किल्लत कोई नैचुरल नहीं है, बल्कि यह जानबूझकर की गई एक हरकत है. निज स्वार्थ के लिए देश के एक फीसदी से भी कम लोगों ने 125 करोड़ भारतीयों के सामने मुश्किलों का अंबार खड़ा कर दिया है. लिहाजा, चुनाव आ रहे हैं, अपनी 'जेब में नोट और जेहन में वोट' की ताकत का सूझबूझ के साथ इस्तेमाल करें.

Sunday, April 15, 2018

फांसी के फंदे पर झूल रही एकजुटता



आंख को जाम लिखो, जुल्फ की बरसात लिखो
जिससे नाराज हो उस शख्स की हर बात लिखो
निदा फाजली ने यह गजल शायद उस वक्त कही होगी, जब उनका मन आसपास के माहौल को देखकर खिन्न हुआ होगा. तब शायद उन्होंने कलम उठाकर 'कलमकारों' को झकझोरने और एकजुट होने की बात कहने की एक भरसक कोशिश की, यह बात अलग है कि 'कॉरपोरेट कलमकार' उनकी यह लाइनें समझने के बावजूद जानबूझकर अनदेखा कर रहे हैं. वैसे गुस्सा आज मैं भी हूं. इसलिए नहीं कि आसिफा को न्याय मिलने की लड़ाई में शामिल हूं. उन्नाव की पीडि़ता के साथ खड़ा हूं. बल्कि इसलिए क्योंकि आज पत्रकारिता की जमात में खड़ा होकर भी मैं अकेला हूं. अपनी बात तो कह सकता हूं, पर सुना किसी को नहीं सकता. क्योंकि 'यशवंत' को मिलने वाली फांसी का मजमा तो यहां लगा नही है, फिर भी फांसी तो दी ही जा रही है.
सोच रहे होंगे किसकी फांसी?
मीडिया जगत में दिखने वाली एकजुटता फांसी के फंदे पर झूलने जा रही है.
आज यह बात तब लिख रहा हूं जब देश के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संचालित केंद्रीय हिन्दी संस्थान के पत्रकारिता विभाग से पासआउट स्टूडेंट्स की मीट में शिरकत की. पहले पहल नजर आया, आयोजकों ने कुर्सियां ज्यादा मंगा लीं, लंच पैकेट भी संख्या के सापेक्ष अधिक लग रहे थे, यह बात अलग है कि कार्यक्रम खत्म होते-होते एक-दो कुर्सी खाली रहीं और दो लंच पैकेट ही बचे, लेकिन असल बात यह थी कि किसी भी शहर में कोई बड़े इवेंट के अवसर पर 'पत्र' से ज्यादा 'पत्रकार' नजर आते हैं. तमाम 'तथाकथित' होते हैं तो कुछेक 'बहुचर्चित', लेकिन अपने ही इवेंट में नदारद रहते हैं. चिंता इसी बात की थी. चर्चा भी हुई. कुछेक बेबाकी से बोले तो कुछेक होठों को दबाकर.
भई क्यों, ऐसा क्या कारण है?
आमजन की समझ से परे हो सकता है. खास जन को फर्क नहीं पड़ता.
कुछ कारण अंगुलियों पर गिने. अब लिख रहा हूं.
वजह पहली साफ है, कई अपने 'रसूखदार' बैनर के मुगालते में रहते हैं.
दूसरी वजह यह है, कुछ वरिष्ठता को कनिष्ठता में बदलने से बचते हैं.
तीसरा कारण यूं है, कुछ 'बिजी विदआउट वर्क' वाले जर्नलिस्ट बने हैं. (शायद मैं भी)
चौथी और आखिरी वजह, 'क्या है इस इवेंट और संगठन में' की सोच भी जेहन में घर किए हुए है.
चिंताजनक है ना ये कारण.
लेकिन, एक बहुत अच्छी, सच्ची और गंभीर बात कही. एक शख्स ने इवेंट के दरम्यान. आप 'बड़े' बाद में बने, पहले संस्थान के 'स्टूडेंट' रहे. 'पत्रकारिता के खलीफा' सरीखे इस शख्स ने अपने पर्यावरणविद् होने का अनुभव दर्शाते हुए अप्रत्यक्ष तौर पर सधे हुए लहजे में कहा कि पहले पौधे थे आप, कई बरसों बाद वटवृक्ष बने हैं. सही कहा आपने 'सर जी'. ओहदों पर बैठकर गुमान करने वाले लोग धरती कम आसमान की तरफ निगाह ज्यादा रखते हैं. पर उन्हें पता नहीं उनके पैर अब भी जमीन पर ही टिके हुए हैं. इस बात का इल्म जब उन्हें लगता है, तब तक वह अपनी शख्सियत को खो चुके होते हैं.
इसलिए
'मेरे दोस्तों, उठो, चलो, भागो, दौड़ो और मरने से पहले जीना न छोड़ो' शब्दों को साकार करिए. अपनी जमात से जुडि़ए. उनकी मदद करिए. उनके लिए आगे बढि़ए. हम एक नहीं होंगे तो 'मालिकान' ही हम पर अपने 'दबावों का मकान' बना लेंगे.
क्योंकि निदा फाजली ने चार लाइन ये भी कहीं हैं कि...

कच्चे बखिय़े की तरह रिश्ते उधड़ जाते हैं, 
हर नये मोड़ पे कुछ लोग बिछड़ जाते हैं
भीड़ से कट के न बैठा करो तन्हाई में, 
इस बेखय़ाली में कई शहर उजड़ जाते हैं 


Friday, April 13, 2018

आतंकवादी बिरयानी खाता है, शिक्षक भूखा ही सो जाता है

आदरणीय प्रधानमंत्री जी, 
महामहिम, 
मैं लोक कल्याणकारी भारत सरकार के सार्वजनिक प्रतिष्ठान हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड/आईजीसी कोलकाता के घाटशिला (झारखंड) यूनिट की कंपनी के अंगीभूत 1972 में स्थापित सुरदा माइन्स उच्च विद्यालय में शिक्षण कार्य करता रहा हूं. विगत 14 वर्षों से मुझे वेतन नहीं दिया जा  रहा है और मैं परिवार समेत भूखे मरने को मजबूर हूं. अत:  महामहिम से विनम्र निवेदन है कि मेरे आवेदन पर सहानुभूति पूर्वक विचार करते हुए बकाए वेतन के भुगतान की व्यवस्था करवाकर हमें कृतार्थ करने की कृपा की जाए या परिवार सहित मृत्यु को आवरण (प्राप्त) करने का आदेश निर्गत करें. 
गणेश चौधरी, 
शिक्षक 

जी हां कुछ यही लिखा है गणेश चौधरी नामक शिक्षक ने खत में, जो आप पढ़ रहे हैं. इसका एक-एक अक्षर सच है. जो कड़वा है, लेकिन हकीकत है. दरअसल, मामला शिक्षक के वेतन से जुड़ा हुआ है, इसलिए हमें पहले इस मामले को पहले समझ लेना जरूरी है और यह जान लेना भी जरूरी है कि नेताओं के जुमलों के आसरे यह देश नहीं चलता बल्कि वादा पूर्ति से देश विकास की ओर चलता है. मामला कुछ यूं है कि दो सितंबर 2002 को हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड/आईसीसी कंपनी ने माइंस और स्कूलोंं को बंद कर दिया. माइंस और स्कूलों को बंद करने के पीछे कंपनी अधिकारियों ने अपनी आर्थिक तंगी का हवाला भी बताया. कंपनी के कर्मचारियों को वीआरएस के तहत भुगतान कर दिया, लेकिन शिक्षकों को एक फूटी कौड़ी नहीं दी गई. तब से लेकर अब तक यह शिक्षक अपने वेतन की जंग लड़ रहे हैं. हर रोज वेतन मिलने की उम्मीद के साथ सुबह उठते हैं और रात में वेतन न मिलने की मायूसी के साथ नींद के आगोश में समा जाते हैं. वेतन लेने के लिए शिक्षकों ने अदालत के दरवाजे भी खटखटाए, लेकिन वहां से भी उन्हें कोई सख्त फैसला या इंसाफ नहीं मिला. बस मिला तो तारीख पे तारीख. जिसने उनकी और कमर तोड़ दी. उम्मीद की एक किरण को भी निराशा के इस स्याह अंधेरे ने घेर लिया. 2014 में देश में सत्ता परिवर्तन हुआ. 'शाइनिंग इंडियाÓ का नारा देने वाली भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मेक इंडियाÓ का नारा बुलंद किया. इस नारे की बुलंदी के साथ कंपनी ने फिर से अपनी घाटशिला की यूनिट को खोल दिया और काम शुरू हो गया, लेकिन स्कूलों को अब भी बंद रखा. शिक्षकों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई. अपनी वेतन संबंधी मांग को दोहराया, यहां तक कि इनमें से एक गणेश चौधरी नामक शिक्षक ने पीएमओ से इच्छा मृत्यु तक मांग डाली. फिर भी तत्काल जवाब और आदेश देने वाला पीएमओ अभी तक खामोश है. उसकी चुप्पी और खत का इंतजार यह शिक्षक कर रहा है. स्कूलों के शिक्षकों की बात करें तो 125 शिक्षकों की माली हालत खराब है. 14 साल के अंदर इनमें से 15 शिक्षकों की मौत हो चुकी है. पांच शिक्षक बीमार हैं, उनमें से दो की हालत गंभीर है. देश का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां पर आतंकवादियों को जेल में बिरयानी खिलाई जाती हैं. एक आतंकवादी पर एक दिन में सिर्फ खाने के लिए सरकारी मंत्रालय के अनुसार 110 रूपया खर्च किया जाता है और देश का भविष्य तैयार करने वाला शिक्षक यहां भूखे पेट सोता है. इसी स्कूल की शिक्षक कली रानी, शमशेर खान, मोहन सिंह, गीतारानी धन आदि तमाम ऐसे नाम हैं, जो अब वेतन मिलने की उम्मीद खो चुके हैं और 'सरकारÓ से इच्छा मृत्यु मांग रहे हैं. अब यह सरकार को तय करना है कि 'इच्छा मृत्युÓ देगी या 'वेतनÓ. शिक्षकों की यह पीड़ा देखकर निदा फाजली का शेर याद आता है कि

ज़हानतों को कहां कर्ब से फरार मिला, 
जिसे निगाह मिली उसको इंतज़ार मिला. 



Wednesday, April 11, 2018

यह हैं आगरा के हंप्टी-डंप्टी


सरकार के सावन की दरकार

हंप्टी-डंप्टी की कविता आपने बचपन में सुनी होगी. कविता के साथ छपी तस्वीरें आज भी आपके जेहन में ताजा होंगी, लेकिन आगरा में कुछ सियासतदां ऐसे हैं, जो इन दो करेक्टर से कम नहीं हैं. वोट मांगने से पहले वह गजब के एक्टर थे और जब चुनाव जीत गए तो उनका करेक्टर सामने आ गया. अब आपसी वर्चस्व की जंग में शहर का एक मुद्दा सिर्फ आसमान में ही बादलों की तरह तैरता नजर आ रहा है. यह मुद्दा है एयरपोर्ट का. सरकार का सावन आए तो यह बादल आगरा की जमीं पर बरस जाए, लेकिन हर साल सरकार तो आती है, पर अपने साथ सावन नहीं लेकर आती. 

युवाओं को मिलेगी काफी मदद
लिहाजा कुछ हेक्टेयर जमीन को अधिग्रहित कर उन पर दो-चार प्लेन उतार देने की बात कहकर अपना वादा पूरा करने की बात यह सियासतदां कर रहे हैं. हो सकता है कि पब्लिक का एक बड़ा हिस्सा या तबका इससे मतलब नहीं रखता हो या फिर कहा जाए कि उसे कोई दिलचस्पी नहीं है उड़ान भरने में. उसे तो अपनी दो वक्त की रोटी चाहिए, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट का स्थायी रूप से समाधान होना सीधे तौर पर आमजन और खास तौर से बेरोजगार युवाओं के लिए काफी मददगार साबित होगा. 

सोसायटी के हाथों को और मजबूत बनाएं

इसके लिए आगरा की सिर्फ एक संस्था 'सिविल सोसायटीÓ मुहिम छेड़े हुए है. कई रिटायर्ड और विद्वत वर्ग के लोग इस सोसायटी से जुड़े हुए हैं, जो चाहते हैं, समझते हैं और जानते हैं कि यदि जेवर में बनने वाला एयरपोर्ट आगरा में बना तो निश्चित तौर पर शहर को एक बड़ी उपलब्धि और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी. इसी कड़ी में उन्होंने आगरा के दो सियासतदां को कार्टून करेक्टर में ढालकर अब तक एयरपोर्ट पर चली प्रोग्रेस को दिखाया है. आइए हम सब भी एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते इस मुहिम का हिस्सा बनें और सोसायटी के जिम्मेदार हाथों को और मजबूत बनाएं. 



कैटवॉक और संवाद अदायगी का जलवा

 

स्टार लाइफ इंटरटेंनमेंट संस्था द्वारा ताजनगरी के सूरसदन में सोमवार को स्टार लाइफ मिस्टर एंड मिस इंडिया 2018 का ग्रांड फिनाले आयोजित किया गया. देश के 40 शहरों में ऑडीशन के बाद चुने गए 96 प्रतिभागियों ने इंट्रोडक्शन व इंडियन डिजाइनर राउंड में अपनी प्रतिभा दिखाई. साथ ही दो राउंड में अपनी कैटवॉक, संवाद अदायगी, आत्मविश्वास, डिजाइनर परिधानों व बेमिसाल सौंदर्य का प्रदर्शन किया.

जमकर बटोरी वाहवाही 
मुख्य अतिथि व के एस ऑयल्स मुरैना के एमडी रमेश गर्ग, स्टार लाइफ के डायरेक्टर हेमंत गर्ग, अनुषा गर्ग व सुशील गोयल ने संयुक्त रूप से दीप जलाकर ग्रांड फिनाले का शुभारंभ किया. कार्यक्रम में निर्णायक मंडल द्वारा चयनित टॉप 15 युवक युवतियों ने अगले दो राउंड में व केवल ट्रेडिशनल व एथनिक वियर्स का शानदार प्रदर्शन कैटवॉक के साथ दिया. प्रतियोगिता में किड्स राउंड में छोटे छोटे 12 बच्चों की कैटवॉक ने भी खूब वाहवाही बटोरी. बच्चों को गिफ्ट देकर उनका उत्साहवर्धन किया गया. 


मधुर गीतों पर लोग झूमते रहे


समारोह में बेस्टवॉक, बेस्टफेस, बेस्ट स्माइल, बेस्ट कांफिडेंस व बेस्ट आइस समेत 12 सब टाइटिल्स प्रदान किए गए. कार्यक्रम का संचालन टीना बहल ने किया. बीच बीच में मशहूर एलबम सिंगर आशुतोष ऋषि के मधुर गीतों पर लोग झूमते रहे. गत वर्ष की मिस इंडिया शिल्पा एल लदीमत, गत वर्ष के फस्र्ट रनरअप हर्षित माहेश्वरी, हितेश गिलमानी व मॉडल रवी सिंह निर्णायक मंडल में शामिल रहे.

डायरेक्टर - खिजर हुसैन
शो प्रॉडक्शन - स्ट्रीट रॉकर्स 
ग्रूमिंग - मीनाक्षी बक्शी
स्टाइलिंग पार्टनर - आश्मिन मुंजाल और रिचा अग्रवाल
डिजायनर्स - अर्जुन कुमार, किंशुक भादुड़ी, विक्की बहल, मुकेश मीनाक्षी हुडा, अमित चौहान

फैशन पार्टनर - साइफिल इस्माइल 
फोटोग्राफर - विवेक कलारिक्कल व कृष्णा कुंज 
ज्वैलरी पार्टनर - फौजिया खान व शिल्पी रचित 
सहयोगी - क्षितिज दीक्षित व साक्षी दीक्षित 

                                                                                                   (Media Prime News)

Monday, April 9, 2018

ये पाठ पढ़ा रहा देश का एक रेलवे स्टेशन


झाड़ू उठाओ. घर झाड़ो. सड़क झाड़ो. मैदान झाड़ो. स्कूल झाड़ो. दफ्तर झाड़ो. स्टेशन झाड़ो. स्टैंड झाड़ो. मिशन चलाओ. स्वच्छता का. स्वच्छ भारत का. ताकि फील गुड हो. शोर सफाई का मचा हुआ है. यह हल्ला कहीं रियल है तो कहीं आर्टीफिशियल. इसी कड़ी में जून 2017 का वाकया याद आता है. अपने भोपाल, इंदौर और उज्जैन के सात दिवसीय टूर के दौरान जब लौट रहा था तो एक स्टेशन दिखा. 

उज्जैनी एक्सप्रेस में बैठे हुए शाम के करीब छह बजे होंगे. तभी उज्जैन से कोई 100 किमी दूर स्टेशन है पढ़ाना-मऊ नजर आया. कहने को एक बहुत छोटा सा स्टेशन है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के मामले में कई बड़े स्टेशनों को मात देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता है. पीने के लिए पानी की टंकी है. फिर भी हैण्डपम्प ताजा पानी उगल रहा था. पक्का प्लेटफॉर्म टाइल वाला. बैठने के लिए बेंच थी तो धूप से बचाते टिनशेड के नीचे इक्का-दुक्का पैसेंजर थे. आसपास हरियाली आंखों को सुकून दिला गई. करीने से रखे गमले और सबसे ज्यादा सफाई ने इंप्रेस किया. स्टेशन पर एंट्री करते ही अजीब सी बदबू भी नहीं महसूस हुई. समुद्र तल से 443 फीट ऊंचाई वाला अद्भुत अनुभव करा गया. यह भी महसूस करा गया कि ठान ली जाए तो मुश्किल कुछ नहीं. आसान है सब करना. इच्छा शक्ति के बल पर फिर चाहे स्टेशन हो या अपना देश. उम्मीद है कि देश की सरकार भी स्टेशन का तरीका आजमाएंगीं.

Friday, April 6, 2018

चारों जुग के हिरन कनेक्शन

 सूरज ढल रहा था. चांद आने को आतुर था


 अभी पूनौ के चांद का कद इतना भी छोटा नहीं हुआ था कि चोर-उचक्कों को फायदा मिल जाए. उसी बीच ठाकुर के खोखे पर रोज की तरह चार दोस्तों की महफिल जम उठी. चार दोस्त यानी, अरून, मनोज, रसूल और अनुज. आते ही अनुज ने ठाकुर को ऑर्डर पेल दिया. ठाकुर लाल चाय बनाओ. मनोज भाई की तरफ से. पकौड़े भी तल देना, लगे हाथ अरून ने ठाकुर को फरमान सुना डाला. लोहे के छोटे ड्रमों को उल्टा करके उनके तलों पर चारों जम गए और शुरू कर दिया गपियाना. काम की फिकर तो थी ही नहीं. क्योंकि मनोज ने बोल ही दिया था, 'डोंट फिकर नेवर चिंता'. गप-सड़ाके की स्टार्टिंग हुई अपने बॉलीबुड के सुल्तान सलमान भाई से. रसूल पहले बोला. यार ये अच्छा नहीं हुआ. अब दबंगई कौन करेगा. तभी बात काटते हुए अनुज बोल उठा, रसूल भाई तुम तो बजरंगी भाईजान के जाने से ऐसे उदास हो गए हो कि तुम्हारे घर का मेंबर चला गया. अरे हिरन मारा था. हां, वो भी काला वाला, मनोज ने सुर मिलाया.

 ठाकुर से चाय के कप उठाकर सर्व करते हुए अरून बोला, देखो भई, वो तो जाना था. तुम खामखां बहस किए जा रहे हो. तुम्हें एक बात नहीं पता होगी. तब तक ठाकुर बोल उठा, जे लेओ भई अपने पकौड़े भी उठा लो, यहन ठंडे पर जाएंगे. मनोज लपककर पहुंचे. और उठा लिया पकौड़ों से चुचाते तेल भरी कागज की प्लेट. उठाते ही दो मुंह में डाले फिर अपने ड्रम के स्टूल पर धर लिए. अरे जज साहब ने सलमान को हिरन बना दिया, और कर ले हिरन का शिकार.... मुंह में दबाते हुए पकौड़ों को मनोज बोला. रसूल बोला वैसे अच्छा भी हुआ. पर यार मेरी एक बात समझ नहीं आई, साला ये हिरन भी अजीब आयटम है. अपना सिकंदरा हो या जोधपुर. सुर्खियों में बना ही रहता है. तभी अरून ने अनुज को भी पकौड़े ऑफर करते हुए कहा कि देखो अनुज श्रवण कुमार को जानते हो. हां भइया. वो ही ना, अपने मम्मी-पापा को डोली में उठाकर तीरथ कराने ले गया था. हां, सही पकड़े हो बेटा अनुज, मनोज तपाक से बोले. अरून ने चाय की चुस्की खींची और बोले तो सुनो बेटा अनुज और हां रसूल तुम भी. सतयुग से लेकर कलियुग में हिरन का गौरवशाली संयोग रहा है. जो भी ताकतवर इंसान मरा या बर्बाद हुआ तो उसके पीछे बड़ी वजह हिरन ही रही है. फिर चाहे श्रवण कुमार रहे हों या महाभारत कराने वाले किशन जी. अब तक सीता मैया को चुराने से पहले हिरन मरने की कथा तो सबने सुनी थी, लेकिन चारों जुग में हिरन का संयोग निकलने की बात सुन 'तीनों' यानी रसूल, मनोज और अनुज. और उत्सुक हो उठे.

अपने बॉस की काल काटते हुए अरून महाशय बोले, सुनो श्रवण कुमार मरे, तब जब दशरथ जी ने समझ लिया तालाब में कोई हिरन पानी पी रहा है, लाओ शिकार कर लेते हैं. साधा निशाना, चलाया तीर और श्रवण कुमार ढेर. जे तो हुई सतयुग की बात. अब आओ त्रेता में. भगवान राम की धर्मपत्नी माता सीता को चुराने से पहले कौन आया. मनोज बाबू ने दिमाग का घोड़ा दौड़ाया और बोले सोने का हिरन. अबे वो सोने का हिरन नहीं था, वो मायावी हिरन था. रामलीला का नहीं, कछु इतिहास पढ़ लेते तो हिरन नहीं बने होते आज काम के मारे, रसूल ने मनोज को तमाचा भरा जवाब दे मारा. चलो कोई नहीं रसूल भाई छोड़ो सुनो, अरून बोले. तो रामचंद जी ने हिरन के जाल में फंसी सीता का किडनैप करने वाले रावण को मारा. यानी हिरन के कारन रावन भी ढेर. ठीक है. अब द्वापर जुग की भी सुन लो, जरा.

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तभी 'सइयां छोड़ न बइयां, मेरी पतली कलइयां मुड़ जाएगी' रिंग टोन बजी मनोज के टेलीफून पर. मनोज ने नाक-भौं सिकोड़ी लंबर देखकर. अबा यार, 'पंडित जी'. तुम झेलो बॉस को. फोन तुम न उठा रहे और वो मेरे पर कर रहे हैं. अब का कहूं उनसे बताओ. अरून ने समझाया कह दो, मेरे साथ हो, दवा लेने गए हो 'भाईसाहबÓ की. मेरी पूछें तो कह देना बाइक चला रहे हैं. इत्ती बात कहके मनोज ने भी फोन काट दिया. तभी रसूले बोले हां तो द्वापर में हिरन का क्या कनेक्शन था, श्रीकिशन जी से. 'सुनो' अरून महाराज बोले - कनेक्शन जे था कि श्रीकिशन जी लेटे पेड़ के नीचे. शिकारी ने दूर से देखा. सोचा हिरन लेटा है. दे मारा तीर. और किशन जी मोक्ष सिधार गए. समझे. अब चल रहा है कलयुग. मामला हाईटेक है. तीर की जगह हाथ में पिस्टल और रायफल आईं. निशाना बनाया ब्लैक बक. इलाका था राजस्थान, और बंदे थे सलमान खान. विश्नोई समाज ने धर लिए. चले गए बेटा जेल. समझ आए 'चारों जुग के हिरन कनेक्शन'. चलो अब उठ लो. कप फेंको. पेमेंट करो और ऑफिस चलो. नहीं तो 'बॉसÓ चिल्ला-चिल्ला के हिरन बना देंगे.