Monday, December 17, 2018

कोर्ट, कुमार, कांग्रेस, कमलनाथ और कमान


इंतजार खत्म हो गया। एक और फैसला आ गया। आया बेशक 33 साल बाद, लेकिन पीड़ितों के अनुसार उन्हें न्याय मिला। दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को 1984 के सिख-विरोधी दंगों को आजादी के बाद की सबसे बड़ी हिंसा करार देते हुए कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। सिख विरोधी दंगे के दिल्ली कैंट के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट की डबल बेंच ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया। कोर्ट ने कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा और पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। निचली अदालत ने सज्जन कुमार को बरी कर दिया था। सज्जन कुमार को हत्या, साजिश, दंगा भड़काने और भड़काऊ भाषण देने का दोषी पाया गया। कुमार को 31 दिसंबर तक सरेंडर करना होगा और तब तक वह दिल्ली नहीं छोड़ सकते।
दरअसल, इस फैसले के कई सियासी मायने निकल रहे हैं। उन पर गौर करना भी जरूरी हो जाता है। फैसले का 33 साल से लंबा इंतजार था, हाई कोर्ट ने यह फैसला उस वक्त सुनाया है, जब देश का राजनीतिक परिवेश पूरी तरह बदला हुआ है। मौजूदा दौर में बीजेपी तीन राज्यों में अपनी सत्ता गंवा चुकी है और चुनाव परिणाम से पहले अपनी नई राजनीतिक इबारत फिर से लिखने वाली कांग्रेस ने बीजेपी की जमीन को छीन लिया है। लेकिन दूसरी ओर कांग्रेस को एक बड़ा झटका भी इस फैसले ने दिया। क्योंकि 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में फैले सिख विरोधी दंगों को भड़काने में एक नाम कमलनाथ का भी शामिल है। एक तरफ दिल्ली में जब हाई कोर्ट की बेंच यह फैसला सुना रही थी, ठीक उसी वक्त मध्य प्रदेश में कमलनाथ बतौर मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण कर रहे थे। चूंकि उनका नाम केस से जुड़ा है, तो विपक्ष में बैठी भाजपा सीएम से इस्तीफे की मांग को मुददा बनाकर जोरदार माहौल खड़ा करने में कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहेगी।


बल्कि केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने तो त्वरित कमेंट करते हुए कहा कि सज्जन कुमार सिख-विरोधी दंगों का प्रतीक थे। अब हमें उम्मीद है कि अदालतें सिख-विरोधी दंगों के सभी मामलों के जल्द निपटारे के लिए काम करेंगी।“ साथ ही उन्होंने कमलनाथ के बारे में कहा, “सिख समुदाय का मज़बूती से मानना है कि वह इसमें शामिल रहे थे। यह विडंबना है कि फैसला आया उस दिन है, जब सिख समाज जिस दूसरे नेता को दोषी मानता है, कांग्रेस उसे मुख्यमंत्री की शपथ दिला रही है।’ न सिर्फ बीजेपी बल्कि अन्य कांग्रेस विरोधी दलों को भी जुबानी जंग छेड़ने की बाजी हाथ लगी है। वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा, 1984 सिख विरोधी दंगों में सज्जन कुमार को दोषी करार दिए जाने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करता हूं। पीड़ितों के लिए यह बहुत लंबा और दर्द से भरा इंतजार रहा। किसी भी तरह के दंगों में शामिल किसी व्यक्ति को नहीं बख्शा जाना चाहिए, बेशक वह कितना ही ताकतवर हो।’
इधर, 2019 में देश के आम चुनावों पर भी इस केस के फैसले का असर पड़ना जाहिर सी बात है। अपनी पप्पू की इमेज से निकलकर एक परिपक्व नेता बनकर उभरे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए लोकसभा चुनावों की डगर आसान नहीं होगी। महागठबंधन में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को नेतृत्व सौंपने की बात तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडु ने कही थी। यह कमान कांग्रेस की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर ही सौंपी गई। लेकिन कांग्रेस के आला नेता के सिपहसालारों का ही दामन जब दागदार है तो वह इस गठबंधन की छवि को बेदाग कैसे रख सकते हैं, यह एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। ऐसे में प्रयागराज और रायबरेली में कांग्रेस के खिलाफ गरजने वाले भाजपा के आलाकमानों को एक और मौका हाथ लग गया है।


पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के सहारे सिख समुदाय को अपने साथ रखने की रणनीति भी इस फैसले को निश्चित तौर पर प्रभावित करेगी। क्योंकि कोर्ट रूम में जस्टिस एस. मुरलीधर और विनोद गोयल ने जैसे ही फैसला सुनाया, वहां मौजूद एचएस फुल्का सहित कई वकील रो पड़े. इसके बाद दोनों जजों ने हाथ जोड़े और कोर्टरूम से उठकर चले गए। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद एचएस फुल्का तथा शिरोमणि अकाली दल के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने कोर्ट से बाहर आकर एक दूसरे से गले लगकर खुशी जाहिर की। पीड़ितों ने इसके लिए बीजेपी सरकार को धन्यवाद भी दिया। मनजिंदर सिंह सिरसा ने फैसले पर कहा, ’हमें इंसाफ देने के लिए हम अदालत का शुक्रिया अदा करते हैं... हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को फांसी नहीं दे दी जाती, और गांधी परिवार को घसीटकर अदालत में नहीं लाया जाता, और उन्हें जेल में नहीं डाल दिया जाता।’ तो यह मानना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस से सिख वोट छिटक सकता है। यानि कांग्रेस के लिए 2019 की राह इतनी आसान नहीं है और सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए चुनौती कुछ कम हो जाती है!

Friday, November 30, 2018

आक्रोश में अन्नदाता

सभी फोटोज: अभिजीत शर्मा

रामलीला मैदान में बृहस्पतिवार से डेरा डाले देशभर से आए हजारों किसानों ने आज भारी-भरकम सुरक्षा के बीच संसद मार्ग पर बैठे हुए हैं. कर्ज राहत और उपज का उचित मूल्य देने समेत उनकी कई मांगें हैं. आंध्र प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश समेत देशभर से आए किसान बृहस्पतिवार को रामलीला मैदान में इकट्ठे हुए हैं.
सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाकर बीते दिनों किसान संसद की तरफ से पारित दो अहम विधेयकों को पास कराए. पहला कानून किसानों को एक बार में पूरी तरह से ऋण मुक्त किया जाए. दूसरा कृषि उपज का उचित और लाभकारी मूल्य से जुड़ा है. इसमें किसानों की आय फसल की लागत का डेढ़ गुना करने का प्रावधान है.

देश के तमाम राज्यों में 207 किसान संगठन संयुक्त रूप से प्रदर्शन कर रहे हैं. दरअसल, किसान अपनी उपज के लिए लाभकारी दाम, स्वामीनाथ आयोग की सिफारिशें लागू करने एवं कृषि ऋण माफ करने की मांग कर रहे हैं. उन्होंने शहरों में सब्जियों, फलों, दूध और अन्य खाद्य पदार्थों की आपूर्ति रोक दी है. व्यापारियों का कहना है कि आपूर्ति में कमी के चलते सब्जियों एवं अन्य खाद्य पदार्थों के भाव बढ़ गए हैं.

महज वोटर हैं किसान

इन परिस्थितियों को देखने के बाद जेहन में बहुतेरे सवाल उठने लगते हैं. सबसे अहम और चौंकाने वाला सवाल तो यह है कि आखिर किसान को अपनी सुविधाओं के लिए कृषि प्रधान देश में आंदोलन के लिए सड़क पर आना ही क्यों पड़ता है? इसका जवाब किसी सरकार के पास नहीं है. न तो पूर्ववर्ती कांग्रेस की सरकार के पास और ना ही मौजूदा वक्त में भाजपा की सरकार के पास. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि किसानों को सिर्फ सरकारों ने वोट बैंक ही माना है. राष्ट्र की एक संपदा के रूप में काम करने वाले किसान सियासी दलों के लिए महज वोटर बनकर ही रह गए हैं.

समस्याओं पर हाथ कोई नहीं रखता

चुनावी सीजन में लुभावनी घोषणाओं के जरिए अपने पक्ष में किसानों से वोट करवा लिया जाता है. फिर पांच साल अन्नदाता अपने अन्न के लिए मोहताज बना रहता है. सिर्फ घोषणाओं के आसरे किसानों को रिझाने की कोशिश की जाती है, लेकिन उनकी मूल समस्या पर हाथ नहीं रखा है. लिहाजा पहले किसानों की समस्याओं पर फोकस करना जरूरी हो जाता है. वो कौन सी जरूरतें हैं, जिनके समाधान के लिए किसानों को लगभग हर साल या फसली सीजन में अपना घर, खेत और गांव छोड़कर सड़क पर आना पड़ता है. समाधान को यदि सरकारें गंभीरता से ले लें तो किसान ही नहीं शहर में रहने वाले लोगों का जीवन भी सरल हो सकेगा. महंगाई के हालात नहीं बनेंगे और किसानों के आंदोलन की आग से शहरवासी भी नहीं झुलसेंगे. सरकार को इस विषय पर सोचने की जरूरत है.

Thursday, November 29, 2018

'मिताली' पर पितृ सत्तात्मक सोच का 'राज'!



आधुनिकता की चकाचौंध से गर्वित होता अपना देश अभी सामंती सोच से उबर नहीं सका है। भारतीय क्रिकेट टीम की हरफनमौला और रनमशीन कही जाने वाली मिताली राज भी इसका शिकार हुई लगती हैं। टी-20 वर्ल्ड कप में मिताली राज और भारतीय महिला क्रिकेट टीम को जो आशाजनक परिणाम हाथ नहीं लगे, उसके पीछे पितृ सत्तात्मक सोच की प्रबलता से इनकार नहीं किया जा सकता है।
वजह साफ है, टी-20 वर्ल्ड कप के पांच मैच में से तीन में मिताली ने बल्लेबाजी नहीं की। बावजूद इसके वे सबसे ज्यादा रन बनाने वाले टॉप-4 भारतीय बल्लेबाजों में रहीं। उन्होंने 2 मैचों में ही 107 रन बना डाले। इसके इतर हरमनप्रीत ने पांचों मैच में बैटिंग की और 183 रन बनाए। पिछले 20 साल से लगातार अपनी सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंस के बल पर सुर्खियों में रहने वालीं मिताली टी-20 फॉर्मेट में भारतीय बल्लेबाजों से कहीं ज्यादा आगे हैं। 15 नवंबर 2018 तक मिताली 2283 रन बनाकर टी-20 फॉर्मेट में टॉप पर रहीं। जबकि भारतीय पुरूष टीम के हिटमैन कहे जाने वाले रोहित शर्मा 2207 रन बनाकर उनसे दूसरे नंबर पर हैं। विराट कोहली जैसे बल्लेबाज 2102 रन के साथ तीसरे पायदान पर हैं और टी-20 वर्ल्ड कप में टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर 1827 रन के साथ चौथे स्थान पर हैं।
इन्हीं आंकड़ों को यदि मद्देनजर रखा जाए और सेमीफाइनल मैच में मिताली को टीम से बाहर रखने पर शुरू हुए विवाद की जड़ों को खंगाला जाए तो जाहिर तौर पर हर कोई यह सोचने पर मजबूर हो जाएगा कि कहीं न कहीं मिताली किसी बड़ी और गहरी साजिश का शिकार हुईं हैं। मिताली को महत्वपूर्ण मैचों से साइडलाइन करने में हुई साजिश की आशंकाओं को इसलिए भी दरकिनार नहीं किया जा सकता क्योंकि इसके पीछे कई कारण हैं।
अव्वल तो यही है कि भारतीय पुरूष खिलाड़ियों का रिकॉर्ड एक महिला खिलाड़ी खराब किए दे रही है। बीसीसीआई की अपेक्षाकृत कम सुविधा और फीस न मिलने के बावजूद मिताली विराट और रोहित जैसे क्रिकेटर्स से आगे बनी हुई है तो धौनी जैसे धुरंधर उसके टी-20 रिकॉर्ड के आगे पानी नहीं मांग पा रहे। 27 नवंबर 2018 को मिताली ने बीसीसीआई को एक ईमेल के जरिए जो पत्र भेजा उसमें अपनी पीड़ा को लिखते हुए खुलकर कोच रमेश पोवार पर पक्षपात करने का आरोप लगाया।


मिताली ने ऐसी कई घटनाओं का जिक्र करते हुए लिखा, ‘उदाहरण के लिए, मैं जहां भी कहीं बैठती थी, वे उठकर चले जाते थे, नेट्स पर जब दूसरी बल्लेबाज अभ्यास कर रही होती थीं तो वे मौजूद रहते थे, लेकिन जैसे ही मैं बल्लेबाजी के लिए जाती, वे वहां से चले जाते थे। यदि मैं उनसे बात करने की कोशिश करती तो वे अपने फोन में कुछ देखने लगते और वहां से निकल जाते। यह किसी के लिए भी शर्मनाक था। यह बिल्कुल स्पष्ट था कि मुझे अपमानित किया जा रहा था। इसके बावजूद मैंने कभी भी अपना धैर्य नहीं खोया।’ इस बात से तय है कि क्रिकेट जगत में एक महिला खिलाड़ी कैसे आगे बढ़ सकती है। यही सोच कुछ लोगों की बनी हुई है।
दूसरी सबसे बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि एक भारतीय महिला खिलाड़ी इंटरनेशनल लेवल पर अपनी पहचान बनाकर खड़ी हुई है तो उसे डाउन टू अर्थ करने के लिए बीसीसीआई और आईसीसी सरीखी संस्थाओं के पदाधिकारी मौन बने हुए हैं। मिताली की मजबूती से पैरवी करने वाली कोई पदाधिकारी नजर नहीं आता है। यह बात खुद मिताली ने बीसीसीआई के सीईओ राहुल जौहरी और महाप्रबंधक (क्रिकेट ऑपरेशंस) सबा करीम को लिखे लैटर में स्वीकारी है। हालांकि, बुधवार को वेबसाइट 'ईएसपीएन' की रिपोर्ट के अनुसार, महिला टीम के मुख्य कोच रमेश पोवार ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को सौंपी गई रिपोर्ट में मिताली पर कोचों को ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया है।

पोवार ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मिताली ने उन्हें ओपनिंग बल्लेबाजी का मौका नहीं मिलने पर महिला वर्ल्ड टी-20 से नाम वापस लेने और संन्यास लेने की धमकी दी थी। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय महिला वनडे टीम की कप्तान मिताली को कोचों को ब्लैकमेल करना और उन पर दबाव डालना बंद करना चाहिए। उन्हें खुद से पहले टीम के हित को देखना चाहिए। जबकि दैनिक भास्कर में छपी खबर के मुताबिक उन्होंने कहा है, ‘20 साल के करियर में मैं पहली बार खुद को अपमानित, हतोत्साहित, निराश महसूस कर रही हूं। मैं यह सोचने पर मजबूर हूं कि जो लोग मेरा करियर तबाह करना चाहते हैं और मेरा आत्मविश्वास तोड़ना चाहते हैं, उनके लिए देश को दी जाने वाली मेरी सेवाओं की कोई अहमियत नहीं है।’
मिताली ने पत्र में प्रशासकों की समिति (सीओए) की सदस्य डायना एडुल्जी को पक्षपाती करार दिया। मिताली ने लिखा, ‘मैंने डायना एडुल्जी में हमेशा विश्वास जाहिर किया है। सीओए की सदस्य के तौर पर मैंने हमेशा उनकी इज्जत की है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि वे मेरे खिलाफ अपने पद का इस्तेमाल करेंगी। उन्होंने मीडिया में टी-20 विश्व कप के सेमीफाइनल में मुझे बेंच पर बैठाने के फैसले का जोरदार समर्थन किया। इस बात ने मुझे बहुत परेशान किया, क्योंकि मैंने उन्हें वास्तविक तथ्यों से अवगत कराया था।’


मिताली ने यह भी लिखा है कि ‘मैं टी-20 की कप्तान हरमनप्रीत के खिलाफ नहीं हूं, सिवाय इसके कि उन्होंने आखिरी-11 से मुझे बाहर रखने के कोच के फैसला का समर्थन किया। वह फैसला समझ से परे है। और यह कदम टीम के लिए हानिकारक साबित हुआ। मैं अपने देश के लिए वर्ल्ड कप जीतना चाहती हूं। कोच के फैसले से मैं दुखी हूं कि हमने एक सुनहरा मौका गंवा दिया।’ तो तीसरा कारण भी मिताली की इसी बात से जुड़ा हुआ है। मान लेते हैं कि मिताली टीम को वर्ल्ड कप दिलाने में अहम किरदार अदा करतीं। क्योंकि मिताली भारतीय महिला क्रिकेट टीम की सबसे कामयाब बल्लेबाज हैं।
जाहिर तौर पर उनकी प्रसिद्धि आसमान छू जाती। जो सीधे तौर पर विज्ञापन कंपनियों की निगाह में आ जाती और मिताली एक चिर-परिचित चेहरे से ब्रांड या यूं भी कह सकते हैं सेलिब्रिटी बन जातीं। जो पितृ सत्तात्मक सोच रखने वाले पुरूषों की लॉबी को किसी तरह से गले नहीं उतरती। एक तरह से विज्ञापन कंपनियां अर्ष पर पहुंचे खिलाड़ियों को साइडलाइन कर मिताली की चौखट पर खड़ीं होतीं। मगर, अफसोस ऐसा हो नहीं सका, कुछ लोग अपने मंसूबे में शायद कारगर साबित हुए।
इतिहास खुद को दोहराता है। यह बात भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए अहम है। जो आज मिताली के साथ हो रहा है, कल यह दोहराव किसी और खिलाड़ी के साथ भी घट सकता है। लिहाजा यह सबक भी है और एक नसीहत भी। अन्य खिलाड़ी यदि इस घटना को प्रमुखता से उठाकर अपनी ही साथी की पैरोकारी करें तो बीसीसीआई और आईसीसी में बैठे आला अफसरों के कानों में पड़ी ठेठ को निकालने के लिए काफी होगी।

Tuesday, November 20, 2018

लाठी है हानिकारक, प्रहारक, आधारक




लाठी। यह शब्द सुनने के बाद ही दिल और दिमाग में बांस का एक मजबूत टुकड़े की तसवीर नजर आने लगती है। वर्तमान में देश के एक मजबूत संगठन का प्रतीक भी है लाठी। पंजाब और हरियाणा के लिए तो यह विशेष तौर पर पहचान रखती है। यहाँ रहवासियों के लिए किसी शान से कम नहीं है। लेकिन देखा जाए तो लगभग हर शख्स की ज़िंदगी से लाठी जुड़ी हुई है। जीवन की किसी भी अवस्था में एक बार व्यक्ति इसका प्रयोग करने से नहीं चूकता। बचपन, यौवन और बुढापा। ज़िंदगी के यह तीन रूप हैं। और मैंने महसूस किया कि लगभग तीनों ही रूपों में लाठी किसी न किसी तरह लोगों के साथ रहती है। लेकिन एक और तथ्य और मेरी समझ में 18 नवंबर को उस वक़्त आया जब मोरारी बापू जी के प्रवचन सुने। लाइव नहीं, ऑनलाइन उनके एप पर। मथुरा के विश्राम घाट पर वह राम कथा का रसास्वादन करा रहे थे।


उस दौरान उन्होंने बताया कि लाठी ज़िंदगी के तीनों ही अवस्था में साथ रहती है, लेकिन बाल्यकाल में लाठी व्यक्ति के लिए एक असुरक्षित और असुविधाजनक वस्तु बनकर सामने आती है। क्योंकि बच्चे के हाथ जब लाठी रहती है तो वह निश्चित तौर पर हानिकारक रहेगी। बच्चा हाथ में लाठी लेगा तो वस्तुओं को तोड़ने का काम करता है। वह उससे खेल नहीं सकता। बल्कि वह अपने आप को या किसी अपने को चोट ही देेगा। इसके विपरीत युवावस्था में प्रहारक सिद्ध होती है। इसे हम यूं समझ सकते हैं कि व्यक्ति अपने युवा काल को जीता है तो उसमें ऊर्जा और उत्साह का प्रवाह कुछ ज्यादा ही रहता है। इस जोश में वह अपनी आत्मरक्षा और आत्मबल का प्रदशन करने के लिए लाठी का ही सहारा लेता है। जो उसके लिए प्रहारक साबित होती है। अब आते हैं जिंदगी के अंतिम पड़ाव यानी बुढ़ापा। बुढ़ापे में तन को सीधा चलाने और झुकी कमर का आधारक लाठी ही बनती है। देखा जाए तो लाठी हानिकारक, प्रहारक और आधारक है, और जिंदगी के हर अवस्था में साथ रहती है।

Tuesday, November 6, 2018

हर इक मकां में जला फिर दिया दिवाली का


दिवाली के पावन पर्व के अवसर पर नजीर अकबराबादी की यह नज्म आज भी मौजूँ लगती है। यह मेरे दिल को छू लेने का काम करती है।

हर इक मकां में जला फिर दिया दिवाली का
हर इक तरफ को उजाला हुआ दिवाली का
सभी के दिन में समां भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मजा खुश लगा दिवाली का
अजब बहार का है दिन बना दिवाली का।

जहाँ में यारो अजब तरह का है यह त्योहार
किसी ने नकद लिया और कोई करे उधार
खिलौने खीलों बतासी का गर्म है बाजार
हरइक दुकां में चिरागों की हो रही है बहार
सभों को फिक्र है अब जा यना दिवाली का।

मिठाइयों की दुकानें लगा के हलवाई
पुकारते है कि लाला दिवाली है आई
बतासे ले कोई बर्फी किसी ने तुलवाई
खिलौने वालों की उनसे ज़ियादा बन आई
गोया उन्हो के बां' राज आ गया दिवाली का।

सराफ़ हराम की कौड़ी का जिनका है व्योपार
उन्हींने खाया है इस दिन के वास्ते ही उधार
कहे है हँसके कर्जख्वाह' से हरइक इक बार
दिवाली आई है सब दे चुकायेंगे अय यार
खुदा के फ़ज्ल से है आसरा दिवाली का।

मकान लीप के ठिलिया जो कोरी रखवाई
जला च्रिराग को कौड़ी के जल्द झनकाई
असल जुआरी थे उनमें तो जान सी आई
खुशी से कूद उछलकर पुकारे ओ भाई
शगून पहले, करो तुम जरा दिवाली का ।

किसी ने घर की हवेली गिरी रखा हारी
जो कुछ थी जिन्स मुयस्सर जरा जरा हारी
किसी ने चीज किसी की चुरा छुपा हारी
किसी ने गठरी पड़ोसन की अपनी ला हारी
यह हार जीत का चर्चा पड़ा दिवाली का।

ये बातें सच है न झूठ इनको जानियो यारो
नसीहतें है इन्हें मन में ठानियो यारो
जहां को जाओ यह किस्सा बखानियो यारो
जो जुआरी हो न बुरा, उसका मानियो यारो
'नज़ीर' आप भी है ज्वारिया दिवाली का।

-'नज़ीर' अकबराबादी

Saturday, September 1, 2018

देश के इतिहास में पहली बार न्यायाधीश की काव्य टिप्पणी


मानव सभ्यता और भारतीय संस्कृति पर करारी चोट है यह
राजस्थान के झुंझनू में मलसीसर के डाबड़ीधीर सिंह गांव में दो अगस्त को तीन साल की मासूम के साथ 21 साल के युवक विनोद बंजारा ने दरिंदगी की हदों को पार करते हुए दुष्कर्म किया। इस मामले में 19 दिन पहले पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की। शुक्रवार को इस मामले में बाल अधिकार संरक्षण अायोग अधिनियम की विशेष न्यायालय की न्यायाधीश नीरजा दाधीच ने इस पर फैसला सुनाते हुए दोषी विनोद बंजारा को फांसी की सजा सुनाई। दुष्कर्म की सजा फांसी हो, इससे बेहतर न्याय पीड़ित और उसके परिवार के लिए नहीं हो सकता। बेशक आप यह तर्क दे सकते हैं कि इसमें कौन सा बड़ा और सख्त फैसला न्यायाधीश ने सुना दिया। यह तो देश की कई उच्च और सर्वोच्च अदालतें कई बार बहुचर्चित मामलों में सुना चुकी हैं। फिर नई बात क्या हो गई। हां, यह तर्क सही हो सकता है, लेकिन नई और खास बात इस फैसले में न्यायाधीश की टिप्पणी, भावुकता और संवेदनाओं का जिक्र, जिन शब्दों में किया गया है, वह अंर्तमन को झकझोर देने वाले हैं।

अंतर्मन को झकझोरने वाली टिप्पणी
भारत के इतिहास में यह पहली मर्तबा है, जब किसी न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी को काव्यात्मक लहजे में पेश किया है। न्यायाधीश नीरजा दाधीच ने 20 लाइन की कविता में दरिंदगी के खिलाफ जो टिप्पणी की है, वह उन परिवारों की पीड़ा है, जो इस दंश को कई सालों से झेल रहे हैं। अपनी कविता में सिर्फ और सिर्फ पीड़ितों का दर्द लिखा है। वह पीड़ा लिखी है, जिसे देख और सुनने के बाद कई रात वह सो नहीं पाते। जिसे झेलने के बाद उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि पर एक ना मिटने वाला दाग लग जाता है। उस दर्द को लेकर वह हर पल सिहरते हैं, सिसकते हैं, रोते हैं, कराहते हैं, पर उनके आंसू पौंछने वाला कोई हाथ नहीं होता। अंतिम पंक्तियों में न्यायाधीश ने जिस तरह से मानव सभ्यता और देश की संस्कृति के साथ प्रकृति की एक विस्मयकारी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं, वह वास्तव में अंर्तमन को झकझोर देते हैं।

पेश है वह संवेदनाओं से भरी कविता
इस पीडीएफ पर नजर डालिए

Monday, August 6, 2018

गमों का तूफान दिल में समेटकर हंसी की सुनामी लाने का नाम है जोकर


जोकर। नाम सुनकर दिल और दिमाग पर रंग-पुता चेहरा, नाक पर चेरी, आंखें बड़ी-बड़ी, तन पर चटख रंग के परिधान और गुदगुदाती हरकतों से भरी तस्वीर सामने आ जाती है। अधिकांश लोग जोकर के रूप में राजकपूर की इमेजिन कर लेते हैं तो कोई 52 प्लेकार्ड के पैकेट में निकलने वाले जोकर को अपनी आंखों के सामने ले आते हैं। जोकर कई रूप धरकर आता है। हमको हंसाता है। इतना हंसाता है कि हम अपने गम भूल जाते हैं। यह एक कला है। साधना से आती है। कठिन है, मगर से इंसान की जिद से बढ़कर नहीं। सीखता इंसान ही है। कब, क्यों और कहां पलते हैं यह जोकर। कोई पता नहीं। इनका कोई अपना निजी संसार नहीं है। बचपन में ही जब कोई डॉक्टर, इंजीनियर या बैंकर्स बनने के ख्बाव बुनता है तो हम उन हजारों में या यूं कहिए लाखों में से एक कोई बंदा जोकर बनने का सपना पालता है। यह सपना उसके सामने कोई शुरू से नहीं होता, बल्कि मजबूरी में उठाया गया एक कदम होता है। इसके पीछे मुफलिसी होती है, हिकारत होती है, नफरत होती है या फिर मोहब्बत भी हो सकती है। राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर देखिए। खुद-ब-खुद समझ जाएंगे, लेकिन एक जोकर की जिंदगी वास्तव में क्या होती है, इससे वाकिफ होना भी जरूरी है। गमों के तूफानों को अपने दिल में समाकर हंसी की सुनामी लेकर आता है। फिर चाहे वह मंच हो या फिर सर्कस की रिंग। उसे हंसाना ही पड़ता है। फिर चाहे मालिक हंटर चलाए या वह खुद की मर्जी से काम करे, लेकिन हंसाता जरूर है।


 एक जोकर की कहानी याद आती है, लेकिन यह काफी चौंकाने वाली है। जब से यह कहानी सुनी है, जोकर को देख हंसी कम शक की गुंजाइश ज्यादा बढ़ जाती है। अपने ही देश की है। आतंकी घटनाओं से लगभग हर दिन रूबरू होने वाली सरजमीं से जुड़ी है। बात जम्मू और कश्मीर की कर रहा हूं।  एक जोकर जो कश्मीर की वादियों को हंसाता था। लोगों की उदासी दूर कर चेहरे पर मुस्कान लाता था, लेकिन लोगों को हंसाने वाला सब के गम खुशियों में बदलने वाला एक कश्मीरी युवक कब आतंक का पर्याय बन गया कोई समझ नहीं पाया। डर और मौत का घर बन चुका आतंकी सद्दाम पाडर मौजूदा वक्त में तो जिंदा नहीं है, लेकिन उसके किस्से-कहानी आज भी वादियों में युवाओं के होंठों पर रहते हैं। सुना और पढ़ा है सिर्फ मैंने कि वह जब समय बचता था तो गांव के चौराहे पर लोगों को हंसाया करता था। साथ ही क्रिकेट खेलता दिखता था। उसके बारे में कहा जाता था कि वह लोगों को हंसाने में इतना माहिर था कि उसे देखते ही लोग हंसने लगते थे। सद्दाम को सब जोकर समझते थे, लेकिन एक जोकर ने आतंकी संगठन का हाथ थामा और उसके बाद लोग उसके नाम पर हंसने की जगह उससे डरने, सहमने लगे। यानी इंसान जोकर भी है और आतंकी भी। अब तय हम को ही खुद करना है कि बनना क्या है। 

Monday, July 30, 2018

यह भी संभव है कि शायद हार को हरा दूं...


जोखिम भरा सफर तय करना वाकई कठिन है। कदम-कदम पर मुश्किलों का सबब बनना पड़ता है। जरूरी नहीं कि आप जो फैसला लेकर जिंदगी की राह तय करने जा रहे हैं, वह आपको आपकी मंजिल तक पहुंचाएगी, लेकिन यह भी एक तथ्य सच के बेहद करीब है कि सतत प्रयास और मेहनत के साथ जोखिम उठाने वालों को ही सफलता मिलती है। जुलाई का महीना खत्म होने को है। एक महीने पहले अागरा से हिसार आया था। नई जॉब थी, तो जाहिर तौर पर नया उत्साह और उमंग भी हिलोरे ले रहीं थीं। जॉब वर्क शुरू हुआ। मिनट से घंटे, घंटों से दिन और दिनों से चार हफ्ते कब गुजर गए पता नहीं चला। सरलता से नहीं गुजरे यह दिन। अब भी नहीं गुजर रहे। मन खिन्न रहता है और तन थका हुआ। दिमाग दिन भर उधेड़बुन में लगा रहता है। विचारों का द्वंद्व जेहन में इस कदर दौड़ता है, जैसे किसी व्यस्त रेलवे स्टेशन पर भीड़ का हाल रहता है। नींद-चैन उजड़ चुका है। सब कुछ बेचैन है, सिवा एक बात के। तसल्ली अपनी आर्थिक स्थिति सुधरने की बनी हुई है। यह एक तथ्य सारे झंझावतों को हर दिन नई ऊर्जा देने का कारण बना हुआ है। लेकिन धन के चक्कर में अपना तन-मन सारा दांव पर लगा देना कहां तक उचित है, यह समझ नहीं आता।


एक तरफ मुझे अपनी मंजिल तक पहुंचने की हड़बड़ाहट बनी हुई है तो दूसरी ओर अपनों से पीछे छूटने की घबराहट भी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही। कहते हैं कि मंजिल पाने से बेहतर आनंद तो सफर का होता है, लेकिन यहां हालात विपरीत हैं। यह भी एक व्यवहारिक तथ्य है कि नई नौकरी में आपके समक्ष चुनौतियां अधिक और बेहतर परिणाम कम रहते हैं। विपरीत परिस्थितयों को अपने अनुकूल बनाना ही आपकी क्षमता को दर्शाता है। और किसी विद्वान ने कहा भी है कि आप अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करें यह कोई साहस की बात नहीं है बल्कि अपनी क्षमता से आगे जाकर कोई कार्य करें और उसमें सफलता मिलते तो साहस कहलाता है। बस इन्हीं सफलता भरे मंत्रों को सुनकर, पढ़कर और देखकर अपने आप को जी रहा हूं। देखता हूं कब तक हार से हार मिलेगी। यह भी संभव है कि शायद हार को हरा दूं...

Wednesday, June 20, 2018

...पर गजब भी है जिंदगी



जिंदगी भी बड़ी अजीब है. खेल निराले हैं इसके. कभी हंसाती है. गुदगुदाती है. मुस्कुराती है. छेड़ती है और छोड़कर भी चली जाती है. पल में रंग बदल लेती है. रफ्तार भी पकड़ लेती है. गुमसुम भी बैठ जाती है. आशा और निराशा. दोनों का अनुभव कराती है. मन को झिंझोड़ देती है तो सुकून का अहसास भी इसी जिंदगी में मिलता है. कुछ और भी है जिंदगी के हिस्से में.

कभी जिंदगी के सामने आगे बढऩे का एक रास्ता नहीं सूझता तो कभी कई रास्ते खोल देती है. यह हालात अकेले मेरे साथ नहीं. सबके साथ होता है. कभी एक रास्ता दिखता नहीं और जाना जरूरी होता है. कभी कई रास्ते होते हैं तो एक कदम नहीं बढ़ पाता. नहीं तय कर पाते कि कौन सा रास्ता जिंदगी को मंजिल की तरफ ले जाएगा. मंजिल तक पहुंचाएगा भी या नहीं, यह अंर्तद्वंद जिंदगी को हिलाता रहता है.

फिर भी रास्ता तो चुनना पड़ता है जिंदगी को. कई में से एक राह. गलत चुन ली तो जिंदगी से जंग शुरू हो जाती है. हर कदम पर जद्दोजहद करनी पड़ती है. और सही राह चुनी तो जिंदगी की चाल-चलन ही बदल जाती है. मंजिल का सफर आसान लगता है. यह बात अलग है कि मुश्किल होती है. शुरूआत में कठिनाई आती है, लेकिन चलती है मस्तानी चाल.


यूं ही चलता रहता है इस जिंदगी का सफर. परायों का साथ छूटता नहीं है. अपनों का हाथ पकड़ नहीं आता. है ना अजब जिंदगी, पर गजब भी है जिंदगी...

रंज, गम, चैन ओ सुखन के तमाशे देखे इस जिंदगी ने, 
अपनों से छूटते और परायों से जुड़ते नाते देखे जिंदगी ने. 

Tuesday, June 19, 2018

...तो क्या देश में जॉब नहीं है


सिर्फ सर्च ही करते रहिए जॉब्स
जी हां, यह एक बड़ा और यक्ष सवाल है. तो क्या देश में जॉब नहीं है. बेरोजगार यूं ही भटकेंगे. उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी. उनकी पढ़ाई बेकार जाएगी. प्रोफेशनल और एकेडमिक एजुकेशन के सर्टिफिकेट महज एक कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएगी. देश में बढ़ती बेरोजगारी की दर को देखने के बाद तो कुछ यही माहौल बनता हुआ नजर आ रहा है. बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र के जरिए 2014 के चुनावी वादे में जिस तरह बेरोजगारों को रोजगार दिलाने का वादा किया था, आज वही बीजेपी सरकार अपनी सत्ता का एक सीजन खत्म करने के कगार पर आ चुकी है, लेकिन बेरोजगार वहीं का वहीं बेरोजगारी की दहलीज पर खड़ा हुआ है. चुनावी वादों के आसरे भाजपा ने सत्ता तो हासिल कर ली, लेकिन 18.6 मिलियन युवा आज भी रोजगार की राह को ताक रहा है. 24 जनवरी 2018 को बिजनेस स्टैंडर्ड की छपी रिपोर्ट बताती है कि बेरोजगारी की दर में बेतहाशा वृद्धि हो रही है. यह बढ़ती हुई रेट 3.5 परसेंट हैं. जो अब तक की सबसे ऊंची रेट है. इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (आईएलओ) भी इस बात को स्वीकार करता है. रिपोर्ट के मुताबिक आईएलओ ने कहा है कि 2017 में युवाओं की बेरोजगारी 18.6 मिलियन थी. जो 2018 में 3.5 परसेंट बढ़कर 18.6 मिलियन पर पहुंच गया है. यदि जॉब पैदा नहीं हुए और सरकारों ने रोजगार की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए तो यह ग्राफ 18.9 मिलियन तक के आंकड़े को क्रॉस कर जाएगा. यह दावा भी आईएलओ ने बिजनेस स्टैंडर्ड में किया है.
अब सवाल फिर से वही खड़ा हो जाता है कि
...तो क्या देश में जॉब नहीं है?
इसका जवाब है, नहीं, जॉब हैं. हजारों, लाखों में नहीं करोड़ों में हैं. भरपूर हैं. सरकार के पास भी हैं और प्राइवेट सेक्टर में भी. इसका भी आंकड़ा आपको बतलाते हैं.
17271000 नौकरियां सरकारी क्षेत्र में मौजूदा वक्त पर कैंडिडेट्स की राह तक रहीं हैं.
11422000 नौकरी प्राइवेट सेक्टर में खाली हैं.
43 करोड़ 70 लाख नौकरी असंगठित क्षेत्र में हैं.
इस तरह देखा जाए तो यदि यह जॉब भर लिए जाएं तो देश में बेरोजगारी पल भर में खत्म हो सकती हैं. लेकिन देश में ऐसा हो नहीं रहा. इसके पीछे क्या वजह मानी जाए. कि सरकारें इन जॉब से अनभिज्ञ हैं, लेकिन जब देश के सरकारी संगठन या अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ इस बात की पुष्टि करे कि जॉब हैं तो सरकारों की अनभिज्ञता झुठला जाती है. दूसरा कारण, सत्ता खुद ही नहीं चाहती है कि यह जॉब देश भर के उन तमाम युवाओं को दी जाएं, रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं. सरकार के ऐसा न करने के पीछे मंशा क्या है, यह भी जानना जरूरी है. दरअसल, बेरोजगारी के आसरे सियासी दल अपनी चुनावी रोटियां पकाते हैं. बेरोजगारी उनके घोषणा पत्र में अव्वल नंबर पर रहता है, यदि यह खत्म हो गया तो फिर वह क्या मुद्दा टॉप पर रखेंगे, यह उनके लिए 'प्रॉमिस क्राइसिसÓ की कैटेगिरी में आ जाएगा.
लिहाजा एक बार फिर हम उसी सवाल पर आकर खड़ा हो जाते हैं कि
...तो क्या देश में सरकारें जॉब नहीं दे रही हैं?
उत्तर है जी नहीं. सरकारें जॉब बांट रहीं हैं. यह बात अलग है कि उनका बांटने का ग्राफ कछुआ चाल है. आंकड़े बताते हैं कि पांच साल के अंदर ग्रेजुएट किए युवाओं के लिए सिर्फ 8000 से ज्यादा सरकारी जॉब निकलती नहीं है. साल में औसतन 667 से ही सरकारी मुलाजिम बन पाते हैं. यानी जितने युवा नौकरी पाते हैं, उससे कई सौ गुना युवा बेरोजगार की कतार में खड़े नजर आते हैं. तो क्या इसी दिन के लिए देश में बीजेपी को गद्दीनशीन कराया गया था बेरोजगारों के द्वारा. यदि हां, तो फिर खड़े रहिए बेरोजगार की लाइन में. क्योंकि सियासी बिसात पर सत्ता तो अपनी चाल ऐसे ही चलेगी. उसके लिए बेरोजगार सिर्फ एक प्यादा हैं, यदि उन्हें मारने से सियासी बिसात पर 'राजाÓ बचता है तो उन्हें डेंजर कॉलम में रखने के लिए सियासी धुरंधरों के हाथ बिलकुल नहीं कांपेंगे. 

Monday, June 18, 2018

भूख और जिंदगी की जंग

यह कुदरत है. कुदरत ने सभी को जीने का अधिकार दिया है. भूख मिटाने का हक भी सभी को है. फिर चाहे इंसान हो या निरीह पशु-पक्षी. दोनों ही अपनी जिंदगी और भूख के लिए ताउम्र जद्दोजहद में लगे रहते हैं. सांस मिटने तक संघर्ष करते हैं. इस संघर्षशील जीवन में कोई सफल होता है और किसी को असफलता हाथ लगती है. बस यूं ही प्रकृति की जीवन श्रंखला चलती रहती है.

अब तस्वीरों में कौवा और चूहा को ही देखिए. दोनों ही भूखे हैं, लेकिन दोनों की भूख अलग है. कौवा भोजन के लिए तड़प रहा है और चूहा अपनी जिंदगी बचाने के लिए. अपनी-अपनी जगह दोनों ही कुदरती नियम का पालन कर रहे हैं. यह नियम है अपनी भूख को शांत करने का संघर्ष.


तस्वीर पहली कुछ यूं बतलाती है कि चूहा दिखा तो उस पर भूखा कौवा झपट पड़ा. जब इंसान
पशु-पक्षियों को दाना-पानी नहीं देंगे तो हालात यही बनेंगे. पशु-पक्षी एक दूसरे को अपना ग्रास बनाएंगे. इसीलिए कौवे ने भी अपनी पेट की आग शांत करने के लिए चूहे को निगल जाने की ठान ली.


दूसरे चित्र में चूहे का संघर्ष नजर आता है. अपनी सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म सांस का अस्तित्व
बचाने के लिए चूहा अपनी सारी ताकत लगा रहा है. एकबारगी तो उसने ऐसा हमला
बोला कि कौवे को भी पीछे दो कदम पीछे खींचने पड़े. 


तीसरी तस्वीर हार और जीत की है. चूहे के हमलावर होने से दो कदम हटने वाले कौवे ने भी इस मर्तबा अपनी सारी शक्ति का भरपूर उपयोग करते हुए चूहे को अपनी चोंच में दबा लिया.
और फिर तब तक छोड़ा ही नहीं, जब तक पूंछ के सहारे मुंह तक चूहे को निगल नहीं गया.
All Pictures By MR. KK Dubey


Saturday, June 9, 2018

'गांव बंद' को मजबूर क्यों किसान

किसानों का संघर्ष
PTI
केंद्र सरकार की कथित किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ किसानों का दस दिवसीय 'गांव बंद' आंदोलन एक जून को शुरु हुआ था. देश के 22 राज्यों में कई किसान संगठन संयुक्त रूप से प्रदर्शन कर रहे हैं. रविवार को किसानों का संघर्ष आराम की अवस्था में आ जाएगा. दरअसल, किसान अपनी उपज के लिए लाभकारी दाम, स्वामीनाथ आयोग की सिफारिशें लागू करने एवं कृषि ऋण माफ करने की मांग कर रहे हैं. उन्होंने शहरों में सब्जियों, फलों, दूध और अन्य खाद्य पदार्थों की आपूर्ति रोक दी है. व्यापारियों का कहना है कि आपूर्ति में कमी के चलते सब्जियों एवं अन्य खाद्य पदार्थों के भाव बढ़ गए हैं.
महज वोटर हैं किसान 
इन परिस्थितियों को देखने के बाद जेहन में बहुतेरे सवाल उठने लगते हैं. सबसे अहम और चौंकाने वाला सवाल तो यह है कि आखिर किसान को अपनी सुविधाओं के लिए कृषि प्रधान देश में आंदोलन के लिए सड़क पर आना ही क्यों पड़ता है? इसका जवाब किसी सरकार के पास नहीं है. न तो पूर्ववर्ती कांग्रेस की सरकार के पास और ना ही मौजूदा वक्त में भाजपा की सरकार के पास. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि किसानों को सिर्फ सरकारों ने वोट बैंक ही माना है. राष्ट्र की एक संपदा के रूप में काम करने वाले किसान सियासी दलों के लिए महज वोटर बनकर ही रह गए हैं.
समस्याओं पर हाथ कोई नहीं रखता
चुनावी सीजन में लुभावनी घोषणाओं के जरिए अपने पक्ष में किसानों से वोट करवा लिया जाता है. फिर पांच साल अन्नदाता अपने अन्न के लिए मोहताज बना रहता है. सिर्फ घोषणाओं के आसरे किसानों को रिझाने की कोशिश की जाती है, लेकिन उनकी मूल समस्या पर हाथ नहीं रखा है. लिहाजा पहले किसानों की समस्याओं पर फोकस करना जरूरी हो जाता है. वो कौन सी जरूरतें हैं, जिनके समाधान के लिए किसानों को लगभग हर साल या फसली सीजन में अपना घर, खेत और गांव छोड़कर सड़क पर आना पड़ता है. पहले यही समझने की कोशिश जरूरी है.
यह समस्याएं कुछ इस तरह की हैं...
पूंजी की कमी
सभी क्षेत्रों की तरह कृषि को भी पनपने के लिए पूंजी की आवश्यकता है. तकनीकी विस्तार ने पूंजी की इस आवश्यकता को और बढ़ा दिया है. लेकिन इस क्षेत्र में पूंजी की कमी बनी हुई है. छोटे किसान महाजनों, व्यापारियों से ऊंची दरों पर कर्ज लेते हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों में किसानों ने बैंकों से भी कर्ज लेना शुरू किया है. लेेकिन हालात बहुत नहीं बदले हैं.
अच्छे बीज
अच्छी फसल के लिए अच्छे बीजों का होना बेहद जरूरी है. लेकिन सही वितरण तंत्र न होने के चलते छोटे किसानों की पहुंच में ये महंगे और अच्छे बीज नहीं होते हैं. इसके चलते इन्हें कोई लाभ नहीं मिलता और फसल की गुणवत्ता प्रभावित होती है.
फसल पर सही मूल्य
किसानों की एक बड़ी समस्या यह भी है कि उन्हें फसल पर सही मूल्य नहीं मिलता. वहीं किसानों को अपना माल बेचने के तमाम कागजी कार्यवाही भी पूरी करनी पड़ती है. मसलन कोई किसान सरकारी केंद्र पर किसी उत्पाद को बेचना चाहे तो उसे गांव के अधिकारी से एक कागज चाहिए होगा.ऐसे में कई बार कम पढ़े-लिखे किसान औने-पौने दामों पर अपना माल बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं.
The Financial Express
कृषि ऋण माफी
सरकारों ने सार्वजनिक और सहकारी बैंकों के जरिए किसानों को लोन देने की व्यवस्था तो लागू कर रखी है. किसान अपने खेत को बंधक रखकर लोन उठा भी लेता है. अमूमन फसली सीजन पर उसे रूपयों की जरूरत पड़ती है तो वह लोन के लिए आवेदन करता है. उसे लोन भी मिल जाता है, लेकिन लोन माफी के नाम पर उसे सिर्फ धोखा ही मिलता है. सरकारें लोन माफी के लिए अपने घोषणा पत्र में प्रावधान तो करती हैं, लेकिन सत्ता पर काबिज होते ही भूल जाती हैं. यदि लोन माफ होता भी है तो मुट्ठी भर किसानों का.
सिंचाई व्यवस्था
भारत में मानसून की सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. इसके बावजूद देश के तमाम हिस्सों में सिंचाई व्यवस्था की उन्नत तकनीकों का प्रसार नहीं हो सका है. उदाहरण के लिए पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में सिंचाई के अच्छे इंतजाम है, लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जहां कृषि, मानसून पर निर्भर है. इसके इतर भूमिगत जल के गिरते स्तर ने भी लोगों की समस्याओं में इजाफा किया है.
भंडारण सुविधाओं का अभाव
भारत के ग्रामीण इलाकों में अच्छे भंडारण की सुविधाओं की कमी है. ऐसे में किसानों पर जल्द से जल्द फसल का सौदा करने का दबाव होता है और कई बार किसान औने-पौने दामों में फसल का सौदा कर लेते हैं. भंडारण सुविधाओं को लेकर न्यायालय ने भी कई बार केंद्र और राच्य सरकारों को फटकार भी लगाई है लेकिन जमीनी हालात अब तक बहुत नहीं बदले हैं.
भूमि पर अधिकार
देश में कृषि भूमि के मालिकाना हक को लेकर विवाद सबसे बड़ा है. असमान भूमि वितरण के खिलाफ किसान कई बार आवाज उठाते रहे हैं. जमीनों का एक बड़ा हिस्सा बड़े किसानों, महाजनों और साहूकारों के पास है जिस पर छोटे किसान काम करते हैं. ऐसे में अगर फसल अच्छी नहीं होती तो छोटे किसान कर्ज में डूब जाते हैं.
Times Now
उक्त समस्याओं के समाधान को यदि सरकारें गंभीरता से ले लें तो किसान ही नहीं शहर में रहने वाले लोगों का जीवन भी सरल हो सकेगा. महंगाई के हालात नहीं बनेंगे और किसानों के आंदोलन की आग से शहरवासी भी नहीं झुलसेंगे. सरकार को इस विषय पर सोचने की जरूरत है.

Thursday, May 31, 2018

अध्ययन औऱ अध्यात्म का सफर

काम का बोझ और मौसम की तपिश ने झिझोड़ कर रख दिया है। शांति की तलाश चाहिए। अध्यात्म भी जरूरी है। सो चल पड़ा हूँ मैं। आगरा से माउंट आबू की तरफ। स्टेशन पर पहुंचकर लगा कि कमजोर काया कैसे चल पाएगी, लेकिन लगभग एक साल के बाद आज फिर से देशाटन के उत्साह ने लबरेज कर दिया है। 3 मंजिला सीढ़ी चढ़ना मुमकिन नहीं था मेरे लिए, फिर भी अपने साथी मिस्टर जॉनी (अमर उजाला में कार्यरत) के उत्साहवर्धन और सहयोग ने मुझमें ऊर्जा का संचार भर दिया। प्लेटफार्म पर पहुंच गया तो ट्रेन भी खड़ी मिली। अपनी सीट तलाशी और बैठ गया पालती मारकर। फिर वही यात्रा का आनंद लेते हुए चला। कोच में रौनक बनी हुई है। 5 साल की बच्ची अपनी माँ के पास पापा से गर्मी लगने की कह रही है। रेलवे पुलिस फोर्स गश्ती पर है। मिडिल बर्थ खुलने लगी है। ट्रेन रफ़्तार पकड़ चुकी है। धीरे-धीरे लोग सीट पर जमकर नींद के आग़ोश में जा रहे हैं। चारों तरफ अंधेरा औऱ दूर चमकती हुई लाइट्स मेरे शहर के पीछे छूटने के संकेत दे रहीं हैं। मेरी आंखों में नींद ने दस्तक देने की शुरुआत कर दी है। शहर पीछे छूट गया। और मैं भी अब सोने के मूड में हूँ। सो अब सोते हैं। कल 10 बजे अपनी मंजिल पर पहुंचने पर फिर आपसे बात करेंगे।

Saturday, May 12, 2018

कुदरत का क्रोध

तीन मई 2018 
अमेरिका के हवाई राज्य में किलायू ज्वालामुखी से निकल रहा लावा 200 फीट तक हवा में उछल रहा है. इससे आसपास के क्षेत्रों में भूकंप के झटके महसूस हो रहे हैं. 31 घर पूरी तरह तबाह हो चुके हैं और 1700 लोगों को अपना घर छोड़कर जाना पड़ा है.
एक्सपर्ट : ज्वालामुखी विशेषज्ञ वेंडी स्टोवाल के अनुसार ज्वालामुखी में बड़ी मात्रा में लावा जमा हुआ है. जब तक यह पूरी तरह निकल नहीं जाता है तब तक विस्फोट जारी रहेंगे. 

सात मई 2018
न्यूजीलैंड के बे ऑफ प्लेंटी के एक फार्म में धरती फट गई. यहां करीब फुटबॉल के दो मैदान के बराबर लंबी और छह मंजिला इमारत जितनी गहरी दरार देखी गई. देश में इसे अब तक का सबसे बड़ा सिंकहोल माना जा रहा है.
एक्सपर्ट : वॉलकैनोलॉजिस्ट बै्रड स्कॉट के अनुसार 200 मीटर लंबा और 20 मीटर गहरा सिंक होल आमतौर पर न्यूजीलैंड में नहीं देखा जाता है. 

11 अप्रैल 2018
130 किमी की रफ्तार से आए तूफान ने आगरा समेत देश के कई शहरों में अपना कहर बरपाया. इस दौरान जान माल की क्षति के साथ फसलों को काफी नुकसान हुआ.
दो मई 2018 
132 किमी की रफ्तार से आया तूफान. देश भर के 13 राज्यों में तूफान की दानवी ताकत ने 130 लोगों की जान ले ली. अभी यह सिलसिला थमा नहीं है. बरकरार है. 
एक्सपर्ट : पर्यावरणविद् अनिल प्रकाश जोशी कहते हैं कि इन सब घटनाओं के शुरुआती संकेत 18वीं शताब्दी से ही मिलने शुरू हो गए थे, जब दुनिया में औद्योगिक क्रांति का जन्म हुआ. आज हालात ये हैं कि कभी बवंडरों से या फिर बाढ़ से या फिर शीतलहर से दुबके पड़े हैं.

आने वाले वक्त में बहुत कुछ अप्रत्याशित दिखेगा
उक्त कुछ घटनाएं आमजन और उन खास जनों को समझनी होंगी. सोचना होगा इन घटनाओं के बारे में आखिर धरती पर यह क्या हो रहा है. ज्यों-ज्यों तकनीकी और विकास का विस्तार होता जा रहा है, आबादी पर उतना ही ज्यादा खतरा मंडरा उठा है. कुदरती क्रोध इतना बढ़ता जा रहा है कि 120 किलोमीटर की रफ्तार से तेज हवाएं चलती हैं और उनका कहर ऐसा कि सैकड़ों लोग एक झटके में मौत के मुंह में चले गए. ये कुछ ऐसा है इसके बारे में आज से 15-20 साल पहले कोई आम शख्स अनुमान भी नहीं लगा सकता था, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसकी चेतावनी जरूर उस समय दे दी थी. इसे ग्लोबल वार्मिंग का नाम दिया गया. ग्लोबल वार्मिंग वो दो शब्द हैं, जिनका असर पूरी दुनिया पर अब ज्यादा इफेक्टिव रुप से दिख रहा है. जनवरी में जारी हुए साल 2017-18 के इकोनॉमिक सर्वे में साफ तौर पर कहा गया था कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से भारत में मध्यावधि में फार्म इनकम 20 से 25 फीसदी तक कम रह सकती है. पशुधन से होने वाली आय में भी 15 से 18 फीसदी की कमी हो सकती है. ये भविष्यवाणी भारत के एग्रीकल्चर सेक्टर को लेकर की गई है. मगर ग्लोबल वार्मिंग का असर इससे बहुत व्यापक पैमाने पर नजर आ रहा है. आने वाले वक्त में बहुत कुछ अप्रत्याशित दिखेगा. इसका अंदेशा भी वैज्ञानिकों को है.

गर्म प्रदेश ठंडे और ठंडे प्रदेश हो रहे गर्म
कई सारी वेबसाइट और पोर्टल खंगालने के बाद मिलीं अहम जानकारियों को पढऩे के बाद यही निष्कर्ष निकला है कि आने वाला वक्त अगली नस्ल के लिए बेहद चुनौती भरा साबित होगा. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट तो डराने में कोई कसर नहीं छोड़ती है कि दुनिया में सबसे ज्यादा गेहूं उत्पादन करने वाला देश केवल ग्लोबल वार्मिंग की वजह से 2050 तक 25 फीसद उत्पादन की कमी झेल सकता है. भारत में बढ़ती आबादी के बीच खाद्यान्न का संकट भी खड़ा हो सकता है. वहीं अमेरिका, यूरोप जैसे ठंडे इलाकों में गेहूं का उत्पादन 25 फीसदी तक बढऩे का अनुमान है. ब्लूमबर्ग की ही रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका, यूरोप में मौसम गर्म हो रहा है, इसकी वजह से वहां ऐसी फसलों की पैदावार बढ़ेगी, जिनका उत्पादन बेहद कम है. यानी ठंडे मौसम वाले प्रदेश गर्म हो रहे हैं और गर्म प्रदेश कहीं ज्यादा गर्म हो रहे हैं.

तूफानों की तीव्रता में 3.5 गुना बढ़ोतरी
दुनिया में मौसम की विस्तार से जानकारी देने वाली मंथली मैग्जीन नेचर क्लाइमेट चेंज जरनल में प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट में वर्ष 2015 में वैज्ञानिकों ने बताया था कि आने वाले तूफान कहीं ज्यादा खतरनाक होंगे. वैज्ञानिकों ने कहा था कि जलवायु परिवर्तन की वजह से विनाशकारी तूफान पैदा होंगे. रिपोर्ट में यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता प्रोफेसर जिम एल्सनर के मुताबिक, इन दिनों जो तूफान आ रहे हैं वह पहले के मुकाबले बहुत खतरनाक हैं. शोधकर्ताओं ने पता लगाया कि पिछले 30 सालों में तूफानों की तीव्रता औसतन 1.3 मीटर प्रति सेकंड या 4.8 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ी है.

बढ़ता तापमान बिगाड़ रहा है धरती की सेहत 
इधर, भारत मौसम विज्ञान विभाग (ढ्ढरूष्ठ) के डीजी डॉक्टर केजी रमेश के अनुसार मौसम को लेकर जितनी भी एक्स्ट्रीम कंडीनशन बन रही हैं उनके पीछे ग्लोबल वार्मिंग का हाथ है. जब तापमान बढ़ता है तो वातावरण में मॉइश्चर (नमी) बढ़ जाता है. हवा में नमी का होल्ड ज्यादा हो जाता है और कहीं ना कहीं वो निकलेगा. इसी की वजह से भारी बारिश या भयंकर तूफान जैसी घटनाएं घटती हैं. इसकी वजह से धरती की सेहत भी बिगड़ रही है, इसका खामियाजा हम सभी को उठाना पड़ेगा.

बचने के लिए सदैव सजग रहना होगा
मौसम का मिजाज बदलने का असर पूरे ईको सिस्टम पर पड़ता है. पक्षियों और समुद्री जीवों का बड़े पैमाने पर माइग्रेशन और कुछ प्रजातियों की संख्या में खतरनाक गिरावट इसकी निशानी है. इसके अलावा फसलों की बेल्ट का शिफ्ट होना भी इसका प्रमाण  है. यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना में इकोलॉजी और इवोल्यूशनरी बायलॉजी के प्रोफेसर जॉन वीन्स ने एक्यूवैदर पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इसमें प्रोफेसर कहते हैं कि जलवायु में बदलाव के चलते कुछ प्रजातियां ऐसे इलाकों की ओर चली जाती हैं जो उनके अनुकूल हों. जीवों की कुछ प्रजातियां ऐसी भी हैं जो माइग्रेट नहीं करतीं और आखिर में उनका अस्तित्व मिट जाता है. यह फॉर्मूला सिर्फ पशु-पक्षियों पर ही नहीं बल्कि मानव जाति पर भी लागू होता है. यदि मानव जाति को अपना अस्तित्व धरती पर बचाना है तो पहले धरती को बचाना होगा. आधुनिकता की दौड़ और होड़ में हमें अपने पर्यावरण को भी सहेज कर रखना हमारी जिम्मेदारी बनती है. इसके लिए जरूरी पौधों का रोपण, संरक्षण के अलावा कार्बन उत्सर्जन से बचने के लिए सदैव सजग रहना होगा.

Monday, May 7, 2018

और कहूं तो...

घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

मेरे विदेशी मित्र ने मुझसे एक बार पूछा कि आपका देश क्या है, आप कहां रहते हो? 
सवाल सीधा था, सरल था, पर शायद जवाब देने वाला नहीं. 
मैनें भी उसको कुछ यूं जवाब दिया, जो आपको बताता हूं. 

हमारा देश महान है
इसका क्या गुणगान है
सरल जिसकी जुबान है
तहजीब भी आसान है.

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

हर बाला देवी प्रतिमा
हर बालक भगवान है
नदी जहां पर माता है
जिसे पूजे हर इंसान है

और कहूं तो 
घर-घर बसता हिंदुस्तान है. 

हर धर्म यहां पर चलता
दिल में दिखता ईमान है
हर पर्व यहां पर मनता
उत्साह का आसमान है

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

गोली यहां सैनिक खाता
शहादत उनकी महान है
फिर भी मां यही कहती
मेरा बेटा देश का सम्मान है

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.



ईसाई-मुस्लिम संग रहते
भगवान का होता गुणगान है
मंदिर में भजन-आरती गूंजे 
मस्जिद से गूंजती अजान है

और कहूं तो
घर-घर बसता हिंदुस्तान है.

Saturday, May 5, 2018

मेरी इच्छामृत्यु जरूरी

'मृत्यु के लिए भी मुखर आवाज उठे, इसलिए मेरी इच्छामृत्यु जरूरी'


 मौत जीवन का सच है, लेकिन यही सच को जब व्यक्ति सहजता से स्वीकार कर लेता है तो यकीनन मृत्यु जीवन के सुखद आनंद की ओर ले जाती है. ऐसी ही कुछ कहानी है आस्ट्रेलिया के 104 वर्षीय बुजुर्ग डेविड गुडाल की. जो 10 मई को इच्छामृत्यु को स्वीकार करने के लिए स्विट्जरलैंड रवाना हो चुके हैं. दरअसल, आस्ट्रेलिया में इच्छामृत्यु की इजाजत न होने के कारण गुडाल स्विट्जरलैंड में अंतिम सांस लेंगे.

साइंटिस्ट हैं गुडाल 
पर्थ के एडिथ कोवान यूनिवर्सिटी में गुडाल मानद रिसर्च एसोसिएट हैं. उन्होंने कई शोध कार्य किए हैं. गुडाल का मानना है कि उनके इस कदम से स्वेच्छा से मौत को अपनाने का मुद्दा आस्ट्रेलिया में जोर पकड़ेगा. इच्छामृत्यु की वकालत करने वाली संस्था एक्जिट इंटरनेशनल ने कहा कि आस्ट्रेलिया के सबसे बुजुर्ग और प्रमुख नागरिक को सम्मान के साथ अंतिम सांस लेने के लिए दूसरे देश जाने को मजबूर करना उचित नहीं है.

नहीं है कोई बीमारी
गुडाल को वैसे तो कोई बड़ी बीमारी नहीं है, लेकिन उनका मानना है कि अब उनके जीवन की उपयोगिता नहीं है. उन्होंने स्विट्जरलैंड के बैसेल स्थित एजेंसी लाइफ सर्किल से इच्छामृत्यु के लिए समय लिया है. एजेंसी इस काम में सहायता करती है. आस्ट्रेलिया से रवाना होने से पहले गुडाल ने बताया कि वह स्विट्जरलैंड जाना नहीं चाहते थे, लेकिन खुदकशी का अवसर पाने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ा, क्योंकि आस्ट्रेलिया में इसकी अनुमति नहीं है.
कई देशों में इच्छामृत्यु गैरकानूनी 
गौरतलब है कि दुनिया के 147 देशों में इच्छामृत्यु गैरकानूनी है. आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत में पिछले साल इसे वैधानिक बनाने तक यह प्रतिबंधित था. लेकिन वहां यह कानून जून 2019 से लागू होगा. इसके अलावा केवल वैसे व्यक्ति को इसकी इजाजत होगी जिसे असाध्य रोग हो और जिसकी जिंदगी छह महीने से कम हो.
नम आंखों से बोला गुडबाय 
बीते बुधवार को जब गुडाल विमान में सवार हुए, तो सभी परिजनों ने गुडाल को घेर लिया और अंतिम गुडबाय कहा. वह परिवार के अन्य सदस्यों के साथ फ्रांस के बोरडॉक्स में कुछ दिन बिताने के बाद स्विट्जरलैंड पहुंचेंगे.
योगेश मिश्रा
गेस्ट राइटर











Wednesday, May 2, 2018

बदलाव: सेक्स चेंज का खेल



यूरोपीय देशोंं में पहले जहां भारत की पहचान सरोगेसी देश के रूप में होती थी, लेकिन अब सरोगेसी को लेकर कड़े नियम बनाने के बाद कुछ बदलाव देखने को मिल रहा है तो वहीं दूसरी ओर अब यूरोपीय देशों में भारत की नई पहचान देखने को मिल रही है. आईवीएफ और सरोगेट के बाद भारत दुनिया में सबसे कम पैसों में सेक्स चेंज कराने का वाला देश बनता जा रहा है. सेक्स चेंज कराने के बढ़ते बाजार को लेकर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भी चिंता जता रहा है. आंकड़ों को देखे तो बीते 10 सालों में भारत में सेक्स चेंज कराने का मार्केट धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है. जानकारों का मानना है कि अगर इसी रफ्तार से कई अस्पताल खुलते रहे तो 2020 तक मार्केट दुगुना हो सकता है. इसका असर यह देखने को मिल रहा है कि देश के कई मेट्रोपोलेटियन सिटी में ऐसे अस्पतालों की संख्या में इजाफा हो रहा है. आपको जानकार हैरत होगी कि दुनियाभर के लोग सेक्स चेंज कराने के लिए भारत आने को आतुर है. इसके कई कारण है कि पहला तो यही है भारत में सेक्स चेंज कराने की थैरेपी बाकी के कई देशों से सस्ती और सुगम होती है. देश में बढ़ते व्यापार को लेकर दिल्ली में भी सेक्स चेंज की थैरेपी से जुड़े कई अस्पताल भी खुलने शुरू हो गए है. इन अस्पतालों में सबसे ज्यादा इन्क्वायरी विदेशों से ही आती है. हालांकि अभी दिल्ली में सेक्स चेंज ऑपरेशन का मार्केट छोटा है, लेकिन यह तेजी से बढ़ रहा है. सेक्स चेंज ऑपरेशन ज्यादा सस्ता होने के कारण विदेशों से भी लोग भारत आना चाह रहे हैं.

कई लोग अब भारत का रूख कर रहे हैं


दरअसल, यूरोप के कई देशों में सेक्स चेंज कराने का ऑपरेशन काफी महंगा होता है. लिहाजा यूरोपीय देशों के ट्रांसजेंडर्स भारत में ऑपरेशन करने की चाह रखते हैं. इससे भारत में यह बाजार धीरे-धीरे बढ़ रहा है. आंकड़ों की मानें तो हर साल लगभग 200 भारतीय ही सेक्स चेंज कराने के लिए आते हैं. इसके अलावा हर साल तकरीबन 20 विदेशी ऑपरेशन के लिए भारत आते हैं. बीते दिनों यूएस आर्मी का एक रिटायर्ड जवान भी दिल्ली में सेक्स चेंज कराने के लिए आया था. बेट्टी ऐनी आर्चर नाम के इस पूर्व सैनिक ने दिल्ली के ओलमेक अस्पताल में अपना सेक्स चेंज कराया. बेट्टी ऐनी आर्चर ने अपने जिंदगी के अनुभव के बारे में बताया था कि पुरूष के शरीर में खुद को कैद महसूस कर रहा था. लिहाजा उसने जिंदगी का सबसे बड़ा निर्णय लिया. आमतौर पर थाईलैंड को सेक्स चेज कराने के लिहाज से सबसे मुफीद माना जाता था, लेकिन वहां भी ऑपरेशन की फीस बढऩे से कई लोग अब भारत का रूख कर रहे हैं.

 लिंग परिवर्तन करवाने वालों की संख्या और ऊपर जा सकती है

वैसे किसी भी व्यक्ति के सेंक्स चेज कराना आसान नहीं होता है. इसमें एक व्यक्ति कुछ ही दिनों दूसरी जिंदगी में प्रवेश कर जाता है. यानि उसको महिला से पुरूष या पुरूष से महिला बनना होता है इसके लिए उसे मानसिक तौर से भी तैयार रहना होता है. एक पुरूष जो सेक्स चेंज करना चाहता है उसे पहले 18 महीनों तक औरत की तरह रहना पड़ता है. उसे एक हार्मोन थेरेपी भी करानी पड़ती है. हालांकि अब कई ट्रांसजेंडर्स सेक्स चेंज कराने की चाहत रखते हैं. विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत में सेक्स चेंज ऑपरेशन पश्चिमी देशों के मुकाबले कहीं सस्ता है और फिर यहां वेटिंग लिस्ट भी नहीं है, यानी लोगों को सालों साल इंतजार नहीं करना पड़ता.
यही नहीं दिल्ली में जहां एक ऑपरेशन के लिए चार से पांच लाख रूपए खर्च हुए तो वहीं अमेरिका में 20 लाख के आसपास का खर्च आता. सस्ती थैरेपी और ऑपरेशन को बढ़ावा देने के लिए सरकार मेडिकल टूरिज्म को भी बढ़ावा दे रही है. इससे भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. सरकार के एम वीजा योजना से भी इसमें काफी बदलाव आने की उम्मीद है. हालांकि फिलहाल यह व्यापार करीब 3 अरब डॉलर के आसपास है लेकिन जानकारों की मानें तो यह बाजार 2020 तक तकरीबन 6 अरब डॉलर के आसपास पहुंच जाएगा. इसके अलावा मायानगरी मुंबई में सेक्स चेंज कराने की भी अजब होड़ भी देखी जा रही है. ऐसे मे मेट्रेापोलेटियन सिटी में जहां नए-नए अस्पताल खुल रहे हैं, लिहाजा मेडिकल साइंस की दुनिया में एक नया बाजार बन रहा है.
दूसरी ओर सामाजिक बदलाव की भी नई इबारत लिखी जा रही है. अब सवाल यही उठ रहा है कि सेक्स चेंज करवाकर नई पहचान पाने की ये होड़ किस दिशा में जाएगी यह बहस का मुद्दा है. खबरों की मानें तो मुंबई, नवी मुंबई और ठाणे में लड़के से लड़की और लड़की से लड़का बनने का क्रेज बढ़ा है. हर साल करीब 50 लड़के लड़की में तब्दील हो रहे हैं. बताया जा रहा है कि यह ट्रेंड जितनी तेजी से बढ़ा है उससे लिंग परिवर्तन करवाने वालों की संख्या और ऊपर जा सकती है.

सरकार को कोई कार्रवाई करनी होगी

सेक्स चेंज करने वाले अस्पताल पहले शहर में पहले एक दो ही थे, लेकिन अब इनकी भी संख्या तेजी से बढ़ रही है. इसके अलावा डॉक्टरों का कहना है कि मेल से फिमेल बनने की संख्या बहुत ज्यादा है. पुरुष से महिला बनना आसान भी है और सफलता का प्रतिशत भी ज्यादा है. जिन लड़कों के हाव-भाव लड़कियों जैसे नजर आते हैं, उन्हें आसानी से मेल से फिमेल बनाया जा सकता है. उन्हें बस कुछ महीनों की थैरेपी से गुजरना होता है. उसके बाद ही उनका सफल ऑपरेशन होता है. यकीनन, मेडिकल सांइस की तरक्की से जहां नए रास्ते खोजे हैं तो वहीं दूसरी ओर नई बहस को भी जन्म दिया है. वहीं भारत सरकार की मेडिकल वीजा से भी विदेशी भी आसानी से भारत आकर सेक्स चेज कराने का ऑपरेशन करा रहे हैं. मसलन भारत की भी अब एक नई पहचान विश्व मानचित्र पर बन रही है. ऐसे में इस बाजार पर लगाम लगाने के लिए भारत सरकार को कोई कार्रवाई करनी होगी. (क्रमश:)

योगेश मिश्रा
गेस्ट राइटर 

Tuesday, May 1, 2018

'छोटी' देवी का 'बड़ा' इंतजार


'मेरे पति की मौत हो गई, तब से मजदूरी करती हूं, मजदूरी से 100-200 रूपये मिल जाते हैं, उसी से घर चलता है. तहसीलदार कहे हैं कि मैं जगह देती हूं, छोटी रूको, साल भर हो गए, तीन-चार साल हो गए.'
छोटी देवी, 
कुआं निवासी 
गांव नरेनी, 
जिला बांदा.
जी हां, देख लीजिए, प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना का एक सच यह भी है. सिर पर छत की आस लिए छोटी देवी का इंतजार बड़ा हो गया है. 2022 तक हर व्यक्ति को आवास मुहैया कराने के लक्ष्य की तरफ बढ़ रही केंद्र और यूपी सरकार के अपने ही सूबे में कुछ यह सूरते-हाल देखने के बाद योजना को अमलीजामा पहनाने और उसकी वास्तविकता का अंदाजा स्वत: हो जाता है. कागजी आंकड़ों में पात्रों को लाभांवित करने के बड़े-बड़े आंकड़े पेश करने वाले अफसर बांदा में इस बेवा को घर देने के लिए आश्वासन तो साल-दर-साल देते चले आ रहे हैं, लेकिन घर नहीं दिया जा रहा है. लिहाजा छोटी देवी ने अपना घर जिला बांदा के नरेनी गांव में स्थित एक कुआं को बना लिया है. कुआं बेशक आज कल कारगर साबित न हो रहे हों, लेकिन छोटी देवी का संसार इसी कुआं में अपना दिन गुजारता है. रातें काटता है. गृहस्थी भी चलाता है. चौका-चूल्हा इसी कुआं पर बना हुआ है. कपड़ों की गठरी से लेकर अपनी जरूरत के सामान के दो बक्से भी इस घरनुमा कुआं की मुंडेर पर रखे हुए हैं. और यहीं पर मेहनत मजदूरी करने के बाद छोटी देवी अपनी बेटी रोशनी के साथ दिन-रैन गुजारती है. छोटी देवी और उसकी बेटी रोशनी की कहानी सुनने और पढऩे के बाद कौन नहीं चाहेगा कि इस महिला की मदद की जाए, लेकिन समाज, जाति, गांव, ग्रामीण, सरपंच, संतरी, अफसर, मंत्री और यहां तक कि मुख्यमंत्री तक महिला की मदद तो छोडि़ए एक छत मुहैया नहीं करा पा रहे हैं. लिहाजा छोटी ने अब अपनी छोटी सी दुनिया कुआं में ही बसा रखी है. कुआं को ही पता बना लिया है. आधार बन गया है इस पते से. राशन कार्ड बन गया है इस पते से, लेकिन नहीं बना तो एक घर.

जनता को 'सबका साथ-सबका विकास' का अहसास हो सके
सवाल यह उठता है कि छोटी को घर उस समय में क्यों नहीं मिल पा रहा है, जब लाखों घरों पर करोड़ों रूपया फूंकने का दावा सरकार कर रही है. उत्तर प्रदेश सरकार के आंकड़े गवाह हैं कि 2014 से अब तक प्रदेश में 15 लाख 20 हजार 702 घर बनाए जा चुके हैं. प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत सरकार ने 2014 से अब तक 10384 करोड़ रूपये खर्च किए. बांदा का जिक्र छिड़ा है तो इसके आंकड़ों के पन्नों को भी पलट लीजिए. बांदा में 2014 से अब तक 43 हजार 186 घर बनाए जा चुके हैं, लेकिन सवाल है कि वोटों के लिए बिछाई गई आवास की बिसात के बावजूद महिला को कुआं पर अपना जीवन बिताने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. जबकि सरकार सबका साथ-सबका विकास का नारे में विश्वास रखती है. अब सवाल ये उठता है कि क्या सिर्फ नारे के आसरे ही आमजन को लाभ पहुंचाने का दावा किया जा रहा है, या धरातल पर भी काम हो रहा है. क्योंकि छोटी देवी की हालत और रिहाइश देखने के बाद तो यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति या जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पा रहा है. और फिर छोटी तो एक सिर्फ उदाहरण भर है, 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में ऐसी कई 'छोटी' और 'बड़ी' मिल जाएंगी, जिनके सिर पर छत का साया नहीं है. लिहाजा सरकार को आने वाले चुनावों से पहले ऐसे ही लोगों को चिन्हित करना जरूरी होगा. जिससे जनता को 'सबका साथ-सबका विकास' का अहसास हो सके.



Saturday, April 28, 2018

खुशियों की खुदकुशी का नगर कुशीनगर

शीर्षक पढऩे के बाद आपका जेहन सीधे कुशीनगर के उस ट्रेन हादसे की तरफ मुड़ जाएगा, जिसमें 13 मासूमों की मौत हो गई. वीभत्स नजारा था. लापरवाही थी. संवेदनहीनता भी कही जाएगी. ड्राइवर से लेकर प्रशासन तक की. अब चौराहे पर उतरे हैं. सड़कों पर शोर है. सख्ती है. होनी भी चाहिए. लेकिन मामला आज ट्रेन हादसे का नहीं. जिक्र किसी और बात का है. उक्त हादसा तो एक ड्राइवर की लापरवाही से हुआ, लेकिन दूसरा जो हादसा हम बताने जा रहे हैं, वह संवेदनहीन की पराकाष्ठा का और पार करता हुआ नजर आता है. जानकर भी बाप अपने बेटे की गलती को दरकिनार कर देता है, लेकिन आज का निष्ठुर जमाना बेटे को शायद यह इजाजत नहीं देता है. बेटा जानता है कि यह मेरा पिता है. शरीर से सिर्फ हाड़ है. दिमाग सोचने का सामथ्र्य खो चुका है, और अर्थ. अर्थ की तो इसके बाद बात ही नहीं की जा सकती है, लिहाजा जिस बेटे की शक्ल देखकर वह सांसे लिया करता था, वही बेटा आज अपने बाप की शक्ल सिर्फ घर में देखकर आगबबूला हो उठा. आगे क्या हुआ, इसके लिए हमारे गेस्ट राइटर योगेश मिश्रा जी की मेरठ से कुशीनगर की स्पेशल न्यूज पर फोकस करिए...



पिता गिड़गिड़ाता रहा, बेटे पीटते रहे 
उसका पिता उससे रहम की भीख मांग रहा था, लेकिन बेटा बेदर्द होकर अपने ही बाप पर डंडे बरसा रहा था, वो पिता जिसने जिंदगी के हर मोड़ अपने बेटे की खुशियों के लिए सबकुछ न्यौछावर कर दिया था. जी हां आज के समाज की यह तस्वीर है जिसे हम और आप सभ्य समाज के रूप में परिभाषित करते हैं. संसाधनों के इस युग में संवेदनाएं कितनी सिमट गई है. यूपी के कुशीनगर जिले की ये तस्वीरें सवाल उठा रही हैं. वाकई क्या आज के समाज का ताना-बाना इतना कमजोर हो गया है, कि एक बेटा अपने पिता पर डंडे बरसाने से भी नहीं चूकता है. आइए जरा इस कहानी को समझते है.ं

पिता को ही घर से निकाला 
बताते हैं कुशीनगर जिले के नौका टोला इलाके में नुरूल इस्लाम उर्फ हत्थू के दो बेटे हैं. जब उनके शरीर में ताकत रही तो उन्होंने अपने बेटों को कोई कमी नहीं होने दी. लेकिन उम्र के अंतिम पड़ाव में दोनों बेटों ने ही उनको घर से निकाल दिया. चार साल पहले उन्हें दोनों बेटों-मोनू व रहीम ने घर से भगा दिया था. हालांकि हत्थू की दिमागी हालत ठीक नहीं है, बीते दिनों जब हत्थू अपने घर आया तो उनके बेटों ने उसे रस्सी से बांधकर सड़क पर डंडों से पिटाई कर दी. हालांकि इस दौरान आसपास के लोग बचाने भी आए, लेकिन बेरहम बेटा अपने बाप को पीटता रहा.

Wednesday, April 25, 2018

गठबंधन तो ठीक पर सीट बंटवारे पर मुश्किल


सियासत में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती हैं: कहावत 

मुद्दों के आसरे कभी एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लडऩे वाली पार्टियां अब एक मंच के नीचे ही मोदी लहर के खिलाफ एकजुट होने की कवायद करने में जुटी है. यानि 2019 में महागठबंधन के आसरे ही क्षत्रप राजनीति को ऑक्सीजन मिलेगी. और अगर मोदी लहर को हराने में कामयाब रही तो यही गठबंधन दिल्ली की गद्दी पर भी अपना दावा ठोंक सकेगा.
अखिलेश और मायावती के साथ आने से एक ओर जहां यूपी की सियासी तस्वीर बदलने लगी है तो वहीं दूसरी ओर देश में मोदी को रोकने के लिए एक सियासी मुहिम शुरू हो चुकी है. हालांकि, 2014 के आम चुनाव में जिस प्रकार से मोदी ने तमाम क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया था. अब वहीं क्षेत्रीय दल महागठबंधन के आसरे ही अपनी जमीन तलाश रहे हैं. मायावती, अखिलेश ने 2019 के लिए गठबंधन का ऐलान किया है.
कांग्रेस यदि गठबंधन का हिस्सा नहीं बनी, तो भी एसपी-बीएसपी उसके लिए दो सीटें छोड़ेंगी. लोकसभा चुनाव 2019 के लिए सीट बंटवारे की कसरत में जुटी दोनों पार्टियों ने तय किया है कि रायबरेली और अमेठी सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारेंगी. फिलहाल एसपी-बीएसपी 78 सीटों पर चुनाव लडऩे की तैयारी के साथ सीट बंटवारे को अंतिम रूप दे रही हैं.
हालांकि, अब सबसे ज्यादा नजर यही रहेगी कि यूपी में सपा और बसपा के बीच सीटों को लेकर तालमेल कैसे बनता है. दरअसल, मायावती और अखिलेश के सियासी वजूद के बीच कांग्रेस भी अगर गठबंधन में शामिल होती है तो स्थितियां कुछ भी पेचीदा हो सकती हैं.
ऐसी स्थिति में बीएसपी का पलड़ा भारी है. मायावती लगातार यह भी इशारा करती रही हैं कि वह गठबंधन करेंगी तो उन्हें सम्मानजक सीटें चाहिए. वहीं अखिलेश भी राज्यसभा में बीएसपी की हार के बाद कह चुके हैं कि समाजवादी बड़े दिल वाले हैं.


  
 योगेश मिश्रा
(गेस्ट राइटर)